श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 9: जड़ भरत का सर्वोत्कृष्ट चरित्र  »  श्लोक 11

 
श्लोक
यदा तु परत आहारं कर्मवेतनत ईहमान: स्वभ्रातृभिरपि केदारकर्मणि निरूपितस्तदपि करोति किन्तु न समं विषमं न्यूनमधिकमिति वेद कणपिण्याकफलीकरणकुल्माषस्थालीपुरीषादीन्यप्यमृतवदभ्यवहरति ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; तु—लेकिन; परत:—अन्यों से; आहारम्—भोजन; कर्म-वेतनत:—काम करने के बदले मजदूरी; ईहमान:— पालते देखकर; स्व-भ्रातृभि: अपि—अपने सौतेले भाइयों तक से; केदार-कर्मणि—खेत में काम करने तथा कृषिकार्य देखने में; निरूपित:—लगा हुआ; तत् अपि—उस समय भी; करोति—वह करता था; किन्तु—लेकिन; न—नहीं; समम्—समतल; विषमम्—विषम, ऊबड़-खाबड़; न्यूनम्—कम; अधिकम्—अधिक उठी हुई; इति—इस प्रकार; वेद—जानता था; कण— धान के टूटे दाने, कना; पिण्याक—खली; फली-करण—धान की भूसी; कुल्माष—घुन-लगा अन्न; स्थाली-पुरीष-आदीनि— बर्तन में लगा जला चावल आदि; अपि—भी; अमृत-वत्—अमृत के समान; अभ्यवहरति—खा लेता था ।.
 
अनुवाद
 
 जड़ भरत केवल भोजन के लिए काम करता था। उसके सौतेले भाइयों ने इसका लाभ उठाकर उसे कुछ भोजन के बदले खेत में काम करने में लगा दिया, किन्तु उसे खेत में ठीक से काम करने की विधि ज्ञात न थी। उसे यह ज्ञात न था कि कहाँ मिट्टी डाली जाये अथवा कहाँ भूमि को समतल या ऊँचा-नीचा रखा जाये। उसके भाई उसे टूटे चावल (कना), खली, धान की भूसी, घुना अनाज तथा रसोई के बर्तनों की जली हुई खुरचन दिया करते थे, किन्तु वह इन सबको प्रसन्नतापूर्वक अमृत के समान स्वीकार कर लेता था। उसे किसी प्रकार की शिकायत न रहती और वह इन सब चीजों को प्रसन्नतापूर्वक खा लेता था।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (२.१५) में परमहंस पद का वर्णन इस प्रकार हुआ है—समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्त्वाय कल्पते। जब किसी मनुष्य को इस संसार के सुख-दुख नहीं व्यापते तो वह अमृतत्त्व अर्थात् शाश्वत जीवन के योग्य होता है। भरत महाराज इस संसार में अपने कार्य को समाप्त करने के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ थे, अत: उन्होंने संसार के द्वैत की तनिक भी परवाह नहीं की। वे कृष्णभावनामृत में पूर्ण थे और अच्छे-बुरे तथा सुख-दुख के प्रति विरक्त थे। जैसाकि चैतन्यचरितामृत (अन्त्य ४.१७६) में कहा गया है—
‘द्वैते’ भद्राभद्र-ज्ञान सब-‘मनोधर्म’।

एइ भाल, एइ मन्द,’—सब ‘भ्रम’।

“इस संसार में अच्छे तथा बुरे का विचार मानसिक कल्पना है। अत: यह कहना कि ‘यह अच्छा है और यह बुरा है’, सारी की सारी एक भूल है।” मनुष्य को यह समझना चाहिए कि इस द्वैत-भाव के संसार में यह सोचना कि यह अच्छा है, अथवा यह बुरा है मात्र मनगढ़ंत कल्पना है। फिर भी किसी को इस भावना का अनुकरण न करके समभाव की स्थिति प्राप्त करनी चाहिए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥