श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 9: जड़ भरत का सर्वोत्कृष्ट चरित्र  »  श्लोक 19

 
श्लोक
एवमेव खलु महदभिचारातिक्रम: कार्त्स्‍न्येनात्मने फलति ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
एवम् एव—इस प्रकार; खलु—निस्संदेह; महत्—महापुरुषों के साथ; अभिचार—ईर्ष्या के रूप में; अति-क्रम:—अपराध की सीमा; कार्त्स्न्येन—सदैव; आत्मने—अपने ही ऊपर; फलति—प्रतिफलित होता है, पड़ता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब कोई ईर्ष्यालु व्यक्ति किसी महापुरुष के समक्ष कोई अपराध करता है, तो उसे सदैव उपर्युक्त विधि से दंडित होना पड़ता है।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥