श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 9: जड़ भरत का सर्वोत्कृष्ट चरित्र  »  श्लोक 4

 
श्लोक
तस्यापि ह वा आत्मजस्य विप्र: पुत्रस्‍नेहानुबद्धमना आसमावर्तनात्संस्कारान् यथोपदेशं विदधान उपनीतस्य च पुन: शौचाचमनादीन् कर्मनियमाननभिप्रेतानपि समशिक्षयदनुशिष्टेन हि भाव्यं पितु: पुत्रेणेति ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उस; अपि ह वा—निश्चय ही; आत्म-जस्य—अपने पुत्र का; विप्र:—जड़ भरत के ब्राह्मण पिता (विक्षिप्त भरत); पुत्र स्नेह-अनुबद्ध-मना:—पुत्र प्रेम के कारण मन बँध जाने से; आ-सम-आवर्तनात्—ब्रह्मचर्य आश्रम के समाप्त होने तक; संस्कारान्—संस्कारों को; यथा-उपदेशम्—शास्त्रों में वर्णित विधि के अनुसार; विदधान:—करते हुए; उपनीतस्य—जिसका उपनयन संस्कार हो, उसका; च—तथा; पुन:—फिर; शौच-आचमन-आदीन्—स्वच्छता-मुख, हाथ, पाँव धोने इत्यादि का अभ्यास.; कर्म-नियमान्—कर्म के विधि-विधान; अनभिप्रेतान् अपि—जड़ भरत के न चाहने पर भी; समशिक्षयत्—शिक्षा दी; अनुशिष्टेन—विधि-विधानों का पालन करना सिखाया; हि—निश्चय ही; भाव्यम्—हो; पितु:—पिता से; पुत्रेण—पुत्र; इति— इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 ब्राह्मण पिता का मन अपने पुत्र जड़ भरत (भरत महाराज) के प्रति सदैव स्नेह से पूरित रहता था। उससे सदा अनुरक्त रहते थे। क्योंकि जड़ भरत गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए अयोग्य थे, अत: ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति तक ही उनके संस्कार पूरे हुए। यद्यपि जड़ भरत अपने पिता की शिक्षाओं को मानने में आनाकानी करते तो भी उस ब्राह्मण ने यह सोचकर कि पिता का कर्तव्य है कि अपने पुत्र को शिक्षा दे, जड़ भरत को स्वच्छ रहने तथा प्रक्षालन करने की शिक्षा दी।
 
तात्पर्य
 जड़ भरत ब्राह्मण शरीर में महाराज भरत थे। वे ऊपर ऊपर ऐसा आचरण कर रहे थे मानो जड़, बहरे, गूँगे तथा अन्धे हों। किन्तु वास्तव में भीतर से वे अत्यन्त जागरूक थे। उन्हें कर्मफल तथा भक्तिफल का पूर्ण ज्ञान था। ब्राह्मण शरीर में महाराज भरत अन्त:करण से भक्ति में पूरी तरह डूबे रहते, फलत: उन्हें सकामकर्म के विधि-विधानों के करने की कोई आवश्यकता नहीं थी जैसाकि श्रीमद्भागवत (१.२.१३) में पुष्टि की गई है—स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्। मनुष्य को भगवान् हरि को प्रसन्न करना चाहिए। सकाम कर्म की यही सिद्धि है। इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवत (१.२.८) में यह भी कहा गया है—
धर्म: स्वनुष्ठित: पुंसां विश्वक्सेनकथासु य:।

नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥

“वृत्ति का विचार किये बिना मनुष्यों द्वारा किया धर्म वृथा श्रम ही है यदि उससे परमेश्वर के संदेश के प्रति आकर्षण उत्पन्न नहीं होता।” इन कर्मकाण्डों की तभी तक आवश्यकता पड़ती है जब तक कृष्णभक्ति जागृत नहीं होती। यदि कृष्णभक्ति विकसित हो जाये तो फिर इन कर्मकाण्डों को पहले करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। श्रील माधवेन्द्र पुरी ने कहा है, “हे कर्मकाण्ड के विधि विधान! मुझे क्षमा करो। मैं इनका पालन नहीं कर सकता, क्योंकि मैं भक्ति में पूर्णत: संलग्न हूँ।” वे चाहते थे कि किसी वृक्ष के नीचे बैठकर “हरे कृष्ण महामंत्र” का जप करते रहें। फलत: वे कोई विधि-विधान नहीं करते थे। इसी प्रकार हरिदास ठाकुर एक मुसलमान परिवार में उत्पन्न होने के कारण कर्म-काण्ड पद्धति की शिक्षा शुरू से ही प्राप्त नहीं कर पाये थे, किन्तु वे ईश्वर के पवित्र नाम का निरन्तर जप करते थे। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें नामाचार्य अर्थात् पवित्र नाम के कीर्तन में निपुण आचार्य के नाम से स्वीकार किया। जड़ भरत के रूप में महाराज भरत अपने मन में निरन्तर भक्ति में तल्लीन रहते थे। चूँकि पूर्व के तीन जन्मों में उन्होंने विधि-विधानों का पालन किया था, अत: अब वे उन्हें करने में कोई रुचि नहीं दिखाते थे, यद्यपि उनके ब्राह्मण पिता उनसे ऐसा किये जाने की आशा करते थे।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥