श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 9: जड़ भरत का सर्वोत्कृष्ट चरित्र  »  श्लोक 5

 
श्लोक
स चापि तदु ह पितृसन्निधावेवासध्रीचीनमिव स्म करोति छन्दांस्यध्यापयिष्यन्सह व्याहृतिभि: सप्रणवशिरस्त्रिपदीं सावित्रीं ग्रैष्मवासन्तिकान्मासानधीयानमप्यसमवेतरूपं ग्राहयामास ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (जड़ भरत); च—भी; अपि—निस्संदेह; तत् उ ह—जो कुछ उसका पिता शिक्षा देता; पितृ-सन्निधौ—अपने पिता की उपस्थिति में, पिता के सामने; एव—ही; असध्रीचीनम् इव—मानो उसने कुछ नहीं समझा, असत्य; स्म करोति—करता था; छन्दांसि अध्यापयिष्यन्—चातुर्मास में अथवा श्रावण मास से शुरू करके वेद मंत्रों की शिक्षा देने का इच्छुक; सह—साथ-साथ; व्याहृतिभि:—स्वर्गलोक (भू: भुव: स्व:) के नामों का उच्चारण; स-प्रणव-शिर:—ओंकार से प्रारम्भ करके; त्रि-पदीम्—तीन पदों वाले; सावित्रीम्—गायत्री मंत्र; ग्रैष्म-वासन्तिकान् मासान्—चैत्र से (१५ मई से) प्रारम्भ होने वाले चार मास; अधीयानम् अपि—अध्ययन करते रहने पर भी; असमवेत-रूपम्—अपूर्ण रूप में; ग्राहयाम् आस—जो सिखला दिया, अभ्यास करा दिया ।.
 
अनुवाद
 
 अपने पिता द्वारा वैदिक ज्ञान की समुचित शिक्षा दिये जाने पर भी जड़ भरत उनके समक्ष मूर्ख (जड़) की भाँति आचरण करते। वे ऐसा आचरण इसलिए करते जिससे उनके पिता यह समझें कि वे शिक्षा के अयोग्य हैं और इस प्रकार उसे आगे शिक्षा देना बन्द कर दें। वे सर्वथा विपरीत आचरण करते। यद्यपि शौच के बाद हाथ धोने को कहा जाता, किन्तु वे उन्हें उसके पहले ही धो लेते। तो भी उनके पिता उन्हें बसन्त तथा ग्रीष्म काल में वैदिक शिक्षा देना चाहते थे। उन्होंने उसे ओंकार तथा व्याहृति के साथ-साथ गायत्री मंत्र सिखाने का यत्न किया, किन्तु चार मास बीत जाने पर भी वे उसे सिखाने में सफल न हो सके।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥