श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 9: जड़ भरत का सर्वोत्कृष्ट चरित्र  » 
 
 
 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में भरत महाराज द्वारा ब्राह्मण शरीर धारण करने का वर्णन किया गया है। वे इस शरीर में जड़, मूक तथा बधिर की भाँति बने रहे, यहाँ तक कि जब उन्हें देवी काली के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए प्रस्तुत किया गया तो उन्होंने कोई विरोध नहीं किया और शान्त बने रहे। मृग शरीर त्यागने के बाद उन्होंने एक ब्राह्मण की सबसे छोटी पत्नी के गर्भ से जन्म लिया। इस जन्म में भी उन्हें अपने पूर्वजन्म की गतिविधियों का स्मरण बना रहा और समाज के प्रभाव से बचने के उद्देश्य से वे गूँगे तथा बहरे बन गये। इस बार वे पथच्युत होने से सतर्क रहे। उन्होंने किसी अभक्त के साथ मेल-जोल नहीं रखा। प्रत्येक भक्त को इस विधि का पालन करना चाहिए। जैसाकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने उपदेश किया है—असत्संग-त्याग—एइ वैष्णव-आचार। मनुष्य को चाहिए कि अभक्तों के संग से बिल्कुल दूर रहे, चाहे वे अपने स्वजन ही क्यों न हों। जब भरत महाराज ब्राह्मण शरीर में थे तो उनके पड़ोस के लोग उन्हें विक्षिप्त, जड़ व्यक्ति समझते थे, किन्तु वे अपने अन्त:करण में भगवान् वासुदेव का निरन्तर जप तथा स्मरण करते रहते थे। यद्यपि उनके पिता उन्हें शिक्षा देकर तथा उनका उपनयन संस्कार करके पवित्र बनाना चाहते थे, किन्तु वे इस
प्रकार बने रहे कि उनके माता-पिता उन्हें विक्षिप्त समझें और सुधारने के किसी कार्य में रुचि न लें। इतने पर भी वे किसी प्रकार का अनुष्ठान किये बिना कृष्ण के भक्त बने रहे। उनके मूक रहने से कुछ पशुतुल्य मनुष्यों ने उन्हें अनेक प्रकार से तंग करना प्रारम्भ कर दिया, किन्तु वे सब कुछ सहते रहे। माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् उनकी विमाता तथा सौतेले भाई उनके साथ दुर्व्यवहार करने लगे। वे उन्हें सबसे निकृष्ट भोजन देते, किन्तु वे इसकी तनिक भी परवाह न करते। वे कृष्णभावनामृत में डूबे रहते। एक रात को उनके सौतले भाइयों और माता ने उन्हें धान के खेत की रखवाली करने का कार्य सौंपा। उस समय डाकुओं के एक दल ने उनका अपहरण कर लिया और भद्रकाली पर उनकी बलि देनी चाही। किन्तु जब डाकुओं ने देवी काली के समक्ष भरत महाराज को मारने के लिए कटार उठाई तो देवी काली अपने भक्त के प्रति इस दुर्व्यवहार से चौंक उठीं। वे मूर्ति में से प्रकट हुईं और अपने हाथों में कटार लेकर उन सभी डाकुओं का वध कर दिया। इस प्रकार भगवान् का शुद्ध भक्त अभक्तों के दुर्व्यवहार के प्रति मूक बना रह सकता है। जो चोर तथा उचक्के भक्तों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं उन्हें अन्तत: भगवान् दण्ड देते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥