श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 17

 
श्लोक
सध्रीचीनो ह्ययं लोके पन्था: क्षेमोऽकुतोभय: ।
सुशीला: साधवो यत्र नारायणपरायणा: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
सध्रीचीन:—उपयुक्त; हि—निश्चय ही; अयम्—यह; लोके—संसार में; पन्था:—मार्ग; क्षेम:—मंगलमय, शुभ; अकुत: भय:—निर्भय; सु-शीला:—अच्छे आचरण वाले; साधव:—साधु पुरुष; यत्र—जहाँ; नारायण-परायणा:—जिन्होंने नारायण के मार्ग अर्थात् भक्ति को अपना सर्वस्व मान लिया है ।.
 
अनुवाद
 
 सुशील तथा सर्वोत्तम गुणों से युक्त शुद्ध भक्तों के द्वारा पालन किया जाने वाला मार्ग निश्चय ही इस भौतिक जगत का सबसे मंगलमय मार्ग है। यह भय से रहित है और शास्त्रों द्वारा प्रमाणित है।
 
तात्पर्य
 किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि भक्ति अंगीकार करने वाला व्यक्ति वेदों के कर्मकाण्ड अनुभाग में संस्तुत अनुष्ठानों को सम्पन्न नहीं कर सकता या कि वह आध्यात्मिक विषयों पर चिन्तन करने के लिए पर्याप्त शिक्षित नहीं है। मायावादी सामान्यतया यह आरोप लगाते हैं कि भक्तिमार्ग स्त्रियों तथा अशिक्षितों के लिए है। यह निराधार आरोप है। भक्तिमार्ग का अनुसरण अत्यन्त विद्वान पंडितों, यथा श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रामानुजाचार्य जैसे गोस्वामियों, द्वारा किया गया है। भक्तिमार्ग के ये ही वास्तविक अनुगामी हैं। कोई चाहे शिक्षित या उच्चकुलीन हो या न हो, उसे इनके ही पदचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए। महाजनो येन गत: स पन्था:—मनुष्य को महाजनों के मार्ग का पालन करना चाहिए। महाजन वे हैं जिन्होंने भक्ति के मार्ग को ग्रहण किया हैं (सुशीला: साधवो यत्र नारायणपरायणा:) क्योंकि ऐसे महापुरुष ही पूर्ण पुरुष होते हैं। श्रीमद्भागवत (५.१८.१२) में कहा गया है—
यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वेर्गुणैस्तत्र समासते सुरा:।

“जिसमें भगवान् के प्रति अविचल भक्ति होती है, उसमें देवताओं के समस्त सद्गुण पाये जाते हैं।” किन्तु जो अल्पज्ञ हैं वे भक्तिमार्ग का गलत अर्थ लगाते हैं, इसलिए वे यह आरोप लगाते हैं कि भक्ति उन लोगों के लिए है, जो अनुष्ठान नहीं सम्पन्न कर सकते या चिन्तन नहीं कर सकते। जैसाकि यहाँ पर सध्रीचीन: शब्द से पुष्टि हुई है भक्ति ही वह मार्ग है, जो उपयुक्त है, कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्ड के मार्ग नहीं। मायावादी भले ही सुशीला: साधव: (अच्छे आचरण वाले साधु पुरुष) हों, किन्तु इसमें सन्देह ही है कि वास्तव में वे प्रगति कर रहे हैं, क्योंकि उन्होंने भक्तिमार्ग स्वीकार नहीं किया है। दूसरी ओर, जो लोग आचार्यों के मार्ग का अनुसरण करते हैं वे सुशीला: तथा साधव: हैं। किन्तु इतना ही नहीं, उनका मार्ग अकुतोभय: है अर्थात् वह भय से रहित हैं। मनुष्य को चाहिए कि निर्भय होकर बारह महाजनों तथा उनकी परम्परा का अनुगमन करे और माया के पाश से मुक्त हो ले।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥