श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 22

 
श्लोक
बन्द्यक्षै: कैतवैश्चौर्यैर्गर्हितां वृत्तिमास्थित: ।
बिभ्रत्कुटुम्बमशुचिर्यातयामास देहिन: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
बन्दी-अक्षै:—व्यर्थ ही बन्दी बनाकर; कैतवै:—जुआ खेलने या पासा फेंकने में धोखा देकर; चौर्यै:—चोरी करके; गर्हिताम्—निन्दनीय; वृत्तिम्—पेशों में; आस्थित:—जिसने अपना रखा है (वेश्या की संगति के कारण); बिभ्रत्—पालन करते हुए; कुटुम्बम्—आश्रित पत्नी तथा बच्चों को; अशुचि:—अत्यन्त पापी होने से; यातयाम् आस—कष्ट पहुँचाता था; देहिन:—अन्य जीवों को ।.
 
अनुवाद
 
 यह पतित ब्राह्मण अजामिल अन्यों को बन्दी बनाकर उन्हें जुए में धोखा देकर या सीधे उन्हें लूट कर कष्ट पहुँचाता था। इस तरह से वह अपनी जीविका चलाता था और अपनी पत्नी तथा बच्चों का भरण-पोषण करता था।
 
तात्पर्य
 यह श्लोक संकेत करता है कि वेश्या के साथ अवैध यौन में लिप्त रहने से ही मनुष्य कितना पतित हो जाता है। सती या उच्चकुलीन स्त्री के साथ अवैध यौन सम्भव नहीं, ऐसा केवल कुल्टा शुद्र स्त्रियों के साथ सम्भव है। समाज वेश्यावृत्ति तथा अवैध यौन की जितनी अधिक अनुमति देता है, उतना ही अधिक प्रोत्साहन ठगों, चोरों, लुटेरों, शराबियों तथा जुआ खेलने वालों को मिलता है। इसलिए हम अपने कृष्णभावनामृत-आन्दोलन में सारे शिष्यों को सर्वप्रथम अवैध यौन से बचने की सलाह देते
हैं, क्योंकि यह घृणित जीवन की शुरुआत है, जिसके बाद मांसाहार, जुआ खेलना तथा नशा करना क्रमश: एक के बाद एक आते हैं। वस्तुत:, इन पर रोक बहुत कठिन है, किन्तु यदि पूर्णतया कृष्ण की शरण ग्रहण कर ली जाये तो यह सम्भव है, क्योंकि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के लिए ये गर्हित आदतें धीरे-धीरे अरुचिकर बन जाती हैं। किन्तु यदि समाज में अवैध यौन के बढ़ाने की छूट दे दी जाये तो सारा समाज घृणास्पद बन जायेगा, क्योंकि तब यह धूर्त्तों, चोरों, ठगों इत्यादि से भर जायेगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥