श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 32

 
श्लोक
ऊचुर्निषेधितास्तांस्ते वैवस्वतपुर:सरा: ।
के यूयं प्रतिषेद्धारो धर्मराजस्य शासनम् ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
ऊचु:—उत्तर दिया; निषेधिता:—मना किये जाने पर; तान्—विष्णुदूतों को; ते—वे; वैवस्वत—यमराज के; पुर:-सरा:— सहायक या दूत; के—कौन; यूयम्—तुम सब; प्रतिषेद्-धार:—कौन विरोध कर रहे हो; धर्म-राजस्य—धर्म के राजा, यमराज का; शासनम्—राज्य अधिकार क्षेत्र ।.
 
अनुवाद
 
 जब सूर्य के पुत्र यमराज के दूतों को इस प्रकार मना किया गया तो उन्होंने कहा, “महाशय! आप कौन हैं जिन्होंने यमराज के अधिकार-क्षेत्र को ललकारने की धृष्टता की है?
 
तात्पर्य
 अजामिल अपने पापकार्यों के अनुसार, यमराज के अधिकार-क्षेत्र के अन्तर्गत था, क्योंकि यमराज को समस्त जीवों के पापों पर विचार करने के लिए परम न्यायमूर्ति के रूप में नियुक्त किया गया
है। जब अजामिल को स्पर्श करने से यमराज के दूतों को रोका गया तो उन्हें आश्चर्य हुआ, क्योंकि आज तक उन्हें तीनों लोकों में अपना कार्य करने में कभी किसी ने बाधा नहीं पहुँचाई थी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥