श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 39

 
श्लोक
कथं स्विद् ध्रियते दण्ड: किं वास्य स्थानमीप्सितम् ।
दण्ड्या: किं कारिण: सर्वे आहो स्वित्कतिचिन्नृणाम् ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
कथम् स्वित्—किस साधन से; ध्रियते—लगाया जाता है; दण्ड:—दण्ड; किम्—क्या; वा—अथवा; अस्य—इसका; स्थानम्—स्थान; ईप्सितम्—वांछित; दण्ड्या:—दण्डनीय; किम्—क्या; कारिण:—सकाम कर्मी; सर्वे—समस्त; आहो स्वित्—अथवा कि; कतिचित्—कुछ; नृणाम्—मनुष्यों का ।.
 
अनुवाद
 
 दूसरों को दण्ड देने की विधि क्या है? दण्ड के वास्तविक पात्र कौन हैं? क्या सकाम कर्मों में लगे सारे कर्मी दण्डनीय हैं या उनमें से केवल कुछ ही हैं?
 
तात्पर्य
 जिसके पास दूसरों को दण्ड देने का अधिकार हो उसे चाहिए कि हर किसी को दण्ड न दे। जीव तो असंख्य हैं जिनमें से अधिकांश आध्यात्मिक जगत में हैं और नित्यमुक्त हैं। इन मुक्त जीवों के विषय में निर्णय करने का प्रश्न ही नहीं उठता। थोड़े से ही, शायद एक चौथाई, जीव भौतिक जगत में रहते हैं और भौतिक जगत के जीवों का प्रमुख अंग—८४,००,००० जीवयोनियों में से ८० लाख जीव योनियाँ—तो मनुष्यों से निम्न हैं। ये जीव योनियाँ दण्डनीय नहीं हैं, क्योंकि प्रकृति के नियमों के अन्तर्गत वे स्वत: विकास कर रही
हैं। चेतना में उन्नत मनुष्य उत्तरदायी जीव हैं, किन्तु उनमें से सभी दण्डनीय नहीं हैं। जो लोग उच्च पवित्र कार्यों में लगे हैं, वे दण्ड से परे हैं। जो लोग पापकर्मों में लगे हुए हैं, वे ही दण्डनीय हैं। इसलिए विष्णुदूतों ने विशेष रूप से यह पूछा कि कौन दण्डनीय है और क्यों यमराज को यही भेदभाव करने के लिए नियुक्त किया गया है कि कौन दण्डनीय है और कौन नहीं है? किसी के विषय में किस तरह निर्णय किया जाये? अधिकार का मूल सिद्धान्त क्या है? विष्णुदूतों ने इन्हीं प्रश्नों को उठाया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥