श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 4-5

 
श्लोक
प्रियव्रतोत्तानपदोर्वंशस्तच्चरितानि च ।
द्वीपवर्षसमुद्राद्रिनद्युद्यानवनस्पतीन् ॥ ४ ॥
धरामण्डलसंस्थानं भागलक्षणमानत: ।
ज्योतिषां विवराणां च यथेदमसृजद्विभु: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
प्रियव्रत—प्रियव्रत का; उत्तानपदो:—तथा उत्तानपाद का; वंश:—कुल; तत्-चरितानि—उनके गुण; च—भी; द्वीप— विभिन्न लोक; वर्ष—भूभाग; समुद्र—सागर; अद्रि—पर्वत; नदी—नदियाँ; उद्यान—बाग-बगीचे; वनस्पतीन्—तथा वृक्ष; धरा-मण्डल—पृथ्वी; संस्थानम्—स्थिति को; भाग—विभागों के अनुसार; लक्षण—विभिन्न लक्षण; मानत:—तथा मापें; ज्योतिषाम्—सूर्य तथा अन्य प्रकाशपिंडों का; विवराणाम्—निम्नलोकों का; च—तथा; यथा—जिस तरह; इदम्—यह; असृजत्—उत्पन्न किया; विभु:—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु! आपने राजा प्रियव्रत तथा राजा उत्तानपाद के कुलों तथा गुणों का वर्णन किया है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने इस भौतिक जगत की रचना विविध ब्रह्माण्डों, लोकों, ग्रहों तथा नक्षत्रों, विविध भूभागों, समुद्रों, नदियों, उद्यानों तथा वृक्षों से की जिनके लक्षण भिन्न भिन्न हैं। ये इस धरालोक, आकाश के प्रकाशपिंडों तथा अधोलोकों में विभाजित हैं। आपने इन लोकों का तथा इनमें रहने वाले जीवों का बहुत ही स्पष्ट वर्णन किया है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर यथेदम् असृजद् विभु: शब्दों से यह स्पष्ट रूप से लक्षित होता है कि सर्वशक्तिमान भगवान् ने इस सम्पूर्ण भौतिक जगत की सृष्टि विविध प्रकार के लोकों, नक्षत्रों इत्यादि से की। नास्तिक लोग ईश्वर के हाथ को, जो प्रत्येक सृष्टि में उपस्थित रहता है, छिपाना चाहते हैं, किन्तु वे इसकी व्याख्या नहीं कर सकते कि ये सारी सृष्टियाँ बिना किसी दक्ष बुद्धि तथा सर्वशक्तिमान-बल के कैसे उत्पन्न हुईं। केवल कल्पना करना या चिन्तन करना समय का अपव्यय है। भगवद्गीता (१०.८) में भगवान् कहते हैं—अहं सर्वस्यप्रभव:—मैं हर वस्तु का उद्गम हूँ। मत्त:सर्वं प्रवर्तते—सृष्टि में जो भी विद्यमान है, वह मुझसे उद्भूत है। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता:—जब मनुष्य पूरी तरह से यह समझ लेता है कि मैं अपनी सर्वशक्तिमत्ता से हर वस्तु को उत्पन्न करता हूँ तो वह भक्ति में दृढ़ हो जाता है और मेरे चरणकमलों में पूर्णतया समर्पण कर देता है।” दुर्भाग्यवश अज्ञानी व्यक्ति कृष्ण की सर्वश्रेष्ठता को तुरन्त नहीं समझ पाते। फिर भी यदि वे भक्तों की संगति करते हैं और प्रामाणिक पुस्तकें पढ़ते हैं, तो वे धीरे-धीरे सही ज्ञान को प्राप्त होते हैं, यद्यपि इसमें अनेकानेक जन्म लग सकते हैं। जैसा कि भगवद्गीता (७.१९) में कृष्ण कहते हैं—
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते।

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: ॥

“जो वास्तव में ज्ञानी होता है, वह अनेक जन्म-जन्मांतर के बाद मुझे समस्त कारणों का कारण जानकर मेरी शरण ग्रहण करता है। ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।” वासुदेव, कृष्ण हर वस्तु के स्रष्टा हैं और उनकी शक्ति विविध प्रकारों से प्रदर्शित होती है। जैसा कि भगवद्गीता (७.४-५) में बतलाया गया है, जीव भौतिक शक्ति (भूमिरापोऽनलो वायु:) तथा आध्यात्मिक शक्ति का संयोग है और वह हर सृष्टि में पाया जाता है। अतएव एक ही सिद्धान्त—सर्वोच्च चेतन आत्मा तथा भौतिक तत्त्वों का संयोग—विराट जगत का कारण है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥