श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 41

 
श्लोक
येन स्वधाम्न्यमी भावा रज:सत्त्वतमोमया: ।
गुणनामक्रियारूपैर्विभाव्यन्ते यथातथम् ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
येन—जिस (नारायण) के द्वारा; स्व-धाम्नि—यद्यपि अपने स्थान अर्थात् आध्यात्मिक जगत में; अमी—ये सब; भावा:— अभिव्यक्तियाँ; रज:-सत्त्व-तम:-मया:—भौतिक प्रकृति के तीन गुणों (सतो, रजो तथा तमो) द्वारा उत्पन्न; गुण—गुण; नाम—नाम; क्रिया—कार्यकलाप; रूपै:—तथा रूपों से; विभाव्यन्ते—विविध रूप में प्रकट हैं; यथा-तथम्—सही सही ।.
 
अनुवाद
 
 समस्त कारणों के परम कारण रूप नारायण आध्यात्मिक जगत में अपने धाम में स्थित हैं तथापि वे भौतिक प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण—के अनुसार सम्पूर्ण विराट जगत का नियंत्रण करते हैं। इस तरह विभिन्न जीवों को भिन्न-भिन्न गुण, नाम (यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य), वर्णाश्रम धर्म के अनुसार कार्य तथा रूप प्रदान किये जाते हैं। नारायण सम्पूर्ण विराट जगत के कारणस्वरूप है।
 
तात्पर्य
 वेद हमें सूचित करते हैं—
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्याधिकश्च दृश्यते।

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥

(श्वेताश्वतर उपनिषद् ६.८)

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण सर्वशक्तिमान हैं। उनकी शक्तियाँ विविध हैं, अतएव वे अपने धाम में बने रहने में समर्थ हैं और बिना प्रयत्न के वे तीन गुणों—सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण—की अन्योन्य क्रिया के माध्यम से सम्पूर्ण विराट जगत का अधीक्षण तथा संचालन कर सकते हैं। इन क्रियाओं से विभिन्न रूप, शरीर, कार्य तथा परिवर्तन उत्पन्न होते रहते हैं और वे भलीभाँति घटित होते हैं। चूँकि भगवान् पूर्ण हैं, इसलिए हर कार्य इस तरह चलता रहता है मानो वे प्रत्यक्ष रूप से निरीक्षण कर रहे हों तथा उसमें भाग ले रहे हों। किन्तु नास्तिक लोग तीन गुणों से प्रच्छन्न होने के कारण नारायण को समस्त कार्यों के परम कारण के रूप में नहीं देख सकते। जैसा कि भगवद्गीता (७.१३) में कृष्ण कहते हैं—

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्।

मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम् ॥

“तीनों गुणों (सतो, रजो तथा तमो) के द्वारा मोहग्रस्त यह सारा संसार मुझ गुणातीत तथा अविनाशी को नहीं जानता।” चूँकि मूर्ख संशयवादी मोहित हैं—तीनों गुणों द्वारा मोहग्रस्त हैं, अतएव वे यह नहीं समझ पाते कि नारायण या कृष्ण ही समस्त कार्यों के परम कारण हैं। जैसाकि ब्रह्म-संहिता (५.१) में कहा गया है—

ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द विग्रह:।

अनादिरादिर्गोविन्द: सर्वकारणकारणम् ॥

“गोविन्द कहलाने वाले कृष्ण परम नियन्ता हैं। उनका शरीर नित्य, आनन्दमय तथा आध्यात्मिक है। वे सभी के उद्गम हैं। उनका कोई अन्य उद्गम नहीं, क्योंकि वे समस्त कारणों के परम कारण हैं।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥