श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 43

 
श्लोक
एतैरधर्मो विज्ञात: स्थानं दण्डस्य युज्यते ।
सर्वे कर्मानुरोधेन दण्डमर्हन्ति कारिण: ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
एतै:—इन सबों (सूर्य इत्यादि साक्षियों) के द्वारा; अधर्म:—विधि विधानों से विचलन; विज्ञात:—ज्ञात है; स्थानम्— उचित स्थान; दण्डस्य—दंड का; युज्यते—के रूप में स्वीकार किया जाता है; सर्वे—समस्त; कर्म-अनुरोधेन—सम्पन्न कार्यों पर विचार करते हुए; दण्डम्—दण्ड; अर्हन्ति—योग्यता रखते हैं; कारिण:—पापकर्म करने वाले ।.
 
अनुवाद
 
 दण्ड के पात्र वे हैं जिसकी पुष्टि इन अनेक साक्षियों ने की है कि वे निर्दिष्ट नियमित कार्यों से विचलित हुए हैं। सकाम कर्मों में लगा हुआ प्रत्येक व्यक्ति अपने पापकर्मों के अनुसार दण्ड दिये जाने के लिए उपयुक्त होता है।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥