श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 47

 
श्लोक
वर्तमानोऽन्ययो: कालो गुणाभिज्ञापको यथा ।
एवं जन्मान्ययोरेतद्धर्माधर्मनिदर्शनम् ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
वर्तमान:—वर्तमान; अन्ययो:—भूत तथा भविष्य का; काल:—समय; गुण-अभिज्ञापक:—गुणों को प्रकट कराते हुए; यथा—जिस तरह; एवम्—इस प्रकार; जन्म—जन्म; अन्ययो:—भूत तथा भावी जन्मों का; एतत्—यह; धर्म—धार्मिक सिद्धान्त; अधर्म—अधार्मिक सिद्धान्त; निदर्शनम्—सूचित करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह वर्तमान वसन्त काल भूत तथा भविष्य काल के वसन्त कालों को सूचित करता है, उसी तरह सुख, दु:ख या दोनों से मिश्रित यह जीवन मनुष्य के भूत तथा भावी जीवनों के धार्मिक तथा अधार्मिक कार्यों के विषय में साक्ष्य प्रस्तुत करता है।
 
तात्पर्य
 हमारे लिए भूत तथा भविष्य को समझ पाना बहुत कठिन नहीं है, क्योंकि काल प्रकृति के तीन गुणों के कल्मष के अधीन होता है। वसन्त ऋृतु के आगमन के साथ ही विविध प्रकार के फल-फूल स्वत: प्रकट हो जाते हैं, अत: हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भूतकाल में वसन्त
इसी तरह के फलों तथा फूलों से अलंकृत थी और भविष्य में भी रहेगी। हमारे जन्म- मृत्यु का चक्र काल के भीतर चल रहा है और प्रकृति के गुणों के प्रभाव के अनुसार हम विविध प्रकार के शरीर प्राप्त करते हैं और विविध स्थितियों के अनुकूल बनते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥