श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 50

 
श्लोक
पञ्चभि: कुरुते स्वार्थान् पञ्च वेदाथ पञ्चभि: ।
एकस्तु षोडशेन त्रीन् स्वयं सप्तदशोऽश्नुते ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
पञ्चभि:—पाँच कर्मेन्द्रियों (वाणी, बाहें, पांव, गुदा तथा जननांग) से; कुरुते—करता है; स्व-अर्थान्—अपनी इच्छित रुचियाँ; पञ्च—पाँच इन्द्रियविषय (ध्वनि, रूप, स्पर्श, गन्ध तथा स्वाद); वेद—जानता है; अथ—इस प्रकार; पञ्चभि:— पाँच ज्ञान की (सुनना, देखना, सूँघना, आस्वादन करना तथा अनुभव करना) इन्द्रियों के द्वारा; एक:—एक; तु—लेकिन; षोडशेन—इन पन्द्रहों तथा मन, सोलह के द्वारा; त्रीन्—अनुभव की तीन कोटियाँ (सुख, दुख तथा दोनों का मिश्रण); स्वयम्—वह, स्वयं जीव; सप्तदश:—सत्रहवीं वस्तु; अश्नुते—भोग करता है ।.
 
अनुवाद
 
 पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच इन्द्रियविषयों के ऊपर मन होता है, जो सोलहवाँ तत्त्व है। मन के ऊपर सत्तरहवाँ तत्त्व आत्मा स्वयं जीव है, जो अन्य सोलह के सहयोग से अकेले भौतिक जगत का भोग करता है। जीव तीन प्रकार की स्थितियों का भोग करता है, यथा सुख दु:ख तथा मिश्रित सुख-दु:ख।
 
तात्पर्य
 हर व्यक्ति अपने हाथों, पाँवों तथा अन्य इन्द्रियों से काम में लगा रहता है, जिससे उसके मनोरथों के अनुसार निश्चित लक्ष्य प्राप्त हो सके। वह पाँच इन्द्रियविषयों का अर्थात् रूप, ध्वनि, स्वाद, गंध तथा स्पर्श का आनन्द बिना यह जाने लेना चाहता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है, जो कि परमेश्वर को प्रसन्न करना है। परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण ही मनुष्य को भौतिक स्थितियों में रखा जाता है और तब वह मनमाने ढंग से अपनी स्थिति को सुधारना चाहता है, किन्तु वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेशों का पालन करना नहीं चाहता। फिर भी परमेश्वर इतने दयालु हैं कि वे मोहग्रस्त जीव को यह उपदेश देने के लिए स्वयं आते हैं कि किस तरह आज्ञाकारी बनकर कर्म करना चाहिए और क्रमश: भगवद्धाम लौटना चाहिए, जहाँ वह आनन्द तथा ज्ञान का नित्य शान्तिमय जीवन प्राप्त कर सके। जीव के शरीर होता है, जो भौतिक तत्त्वों का अत्यन्त जटिल संयोग है और इस शरीर से वह अकेले संघर्ष करता है जैसाकि इस श्लोक में एकस्तु शब्दों द्वारा इंगित किया गया है। उदाहरणार्थ, यदि कोई समुद्र में संघर्ष कर रहा है, तो उसे अकेले ही तैर कर उसे पार करना होता है। यद्यपि अन्य अनेक मनुष्य तथा जलचर समुद्र में तैरते रहते हैं, किन्तु उन्हें अपनी देखभाल स्वयं करनी होती है, क्योंकि अन्य कोई उनकी सहायता नहीं करेगा। इसलिए यह श्लोक इंगित करता है कि सत्तरहवीं वस्तु आत्मा को अकेले ही कर्म करना होगा। यद्यपि वह समाज, मैत्री तथा प्रेम उत्पन्न करना चाहता है, किन्तु कृष्ण अर्थात् परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई उसकी सहायता नहीं कर सकेगा। अतएव उसकी एकमात्र चिन्ता यही होनी चाहिए कि कृष्ण को किस तरह तुष्ट किया जाये। कृष्ण भी यही चाहते हैं (सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज)। भौतिक स्थितियों से मोहग्रस्त लोग एक होना चाहते हैं और वे मनुष्यों तथा राष्ट्रों के बीच एकता के लिए प्रयास भी करते हैं, किन्तु उनके सारे प्रयास व्यर्थ हैं। हर व्यक्ति को प्रकृति के अनेक तत्त्वों के साथ अपने अस्तित्व के लिए अकेले ही संघर्ष करना चाहिए। अतएव उसकी एकमात्र आशा कृष्ण की शरण ग्रहण करना है, जैसाकि कृष्ण मंत्रणा देते हैं, क्योंकि वे अज्ञान के सागर से मुक्त होने में सहायता कर सकते हैं। इसीलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रार्थना की है—
अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ।

कृपया तव पादपंकजस्थितधूलीसदृशं विचिन्तय ॥

“हे कृष्ण, हे नन्द महाराज के लाड़ले! मैं आपका नित्यदास हूँ, किन्तु न जाने कैसे इस अज्ञान के सागर में गिर गया हूँ। यद्यपि मैं अत्यधिक संघर्ष कर रहा हूँ, किन्तु अपने को बचाने का कोई उपाय नहीं है। यदि आप मुझे निकाल लें और अपने चरणकमलों में धूल के एक कण की तरह मुझे टिका लें तो उससे मेरी रक्षा हो जायेगी।”

इसी तरह भक्तिविनोद ठाकुर ने गाया है—

अनादि करम-फले, पडि़’ भवार्णव-जले, तरिबारे ना देखि उपाय “हे प्रभु! मुझे स्मरण नहीं है कि कब मैं इस अज्ञान के सागर में किसी तरह से गिर गया और अब अपनी रक्षा करने का मुझे कोई उपाय नहीं सूझ रहा।” हमें स्मरण रखना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने जीवन के लिए जिम्मेदार है। यदि कोई व्यक्ति कृष्ण का शुद्ध भक्त बन जाता है तब तो वह अज्ञान के सागर से उबार लिया जाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥