श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 52

 
श्लोक
देह्यज्ञोऽजितषड्‌वर्गो नेच्छन्कर्माणि कार्यते ।
कोशकार इवात्मानं कर्मणाच्छाद्य मुह्यति ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
देही—देहधारी आत्मा; अज्ञ:—पूर्णज्ञान से रहित; अजित-षट्-वर्ग:—जिसने अनुभवेन्द्रियों तथा मन को वश में नहीं किया; न इच्छन्—न चाहते हुए; कर्माणि—भौतिक लाभ के लिए कर्म; कार्यते—करवाया जाता है; कोशकार:—रेशम का कीड़ा; इव—सदृश; आत्मानम्—स्वयं; कर्मणा—सकाम कर्मों से; आच्छाद्य—आवृत करके; मुह्यति—मोहित हो जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 अपनी इन्द्रियों तथा मन को वश में करने में अक्षम मूर्ख देहधारी जीव अपनी इच्छाओं के विरुद्ध प्रकृति के गुणों के प्रभाव के अनुसार कर्म करने के लिए बाध्य होता है। वह उस रेशम के कीड़े के समान है, जो अपनी लार का प्रयोग बाह्य कोश बनाने के लिए करता है और फिर उसी में बँध जाता है, जिसमें से बाहर निकल पाने की कोई सम्भावना नहीं रहती। जीव अपने ही सकाम कर्मों के जाल में अपने को बन्दी कर लेता है और तब अपने को छुड़ाने का कोई उपाय नहीं ढूँढ़ पाता। इस तरह वह सदैव मोहग्रस्त रहता है और बारम्बार मरता रहता है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि पहले बताया जा चुका है प्रकृति के गुणों का प्रभाव अति प्रबल है। विभिन्न प्रकार के सकाम कर्मों में फँसा जीव बाह्य कोश में बन्दी
रेशम के कीड़े के समान है। जब तक कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् उसकी सहायता नहीं करते, इससे मुक्त हो पाना अत्यन्त कठिन होता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥