श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 53

 
श्लोक
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवश: कर्म गुणै: स्वाभाविकैर्बलात् ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निस्सन्देह; कश्चित्—कोई; क्षणम् अपि—एक क्षण के लिए भी; जातु—किसी भी समय; तिष्ठति—रहता है; अकर्म-कृत्—कुछ भी न करते हुए; कार्यते—करवाया जाता है; हि—निस्सन्देह; अवश:—स्वत:; कर्म—सकाम कर्म; गुणै:—प्रकृति के गुणों द्वारा; स्वाभाविकै:—पिछले जन्मों में अपनी ही प्रवृत्तियों से उत्पन्न; बलात्—बलपूर्वक ।.
 
अनुवाद
 
 एक भी जीव बिना कार्य किये क्षणभर भी नहीं रह सकता। उसे प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति द्वारा कर्म करना ही पड़ता है, क्योंकि यह स्वाभाविक प्रवृत्ति उसे एक विशेष ढंग से कार्य करने के लिए बाध्य करती है।
 
तात्पर्य
 कर्म में स्वाभाविक अर्थात् मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति तो सेवा करने की है, क्योंकि जीव ईश्वर का नित्य दास होता है। जीव सेवा तो करना चाहता है, किन्तु परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाने के कारण वह भौतिक प्रकृति के विविध गुणों के अधीन सेवा करता है और विविध सेवा के रूप गढ़ता है यथा समाजवाद, मानवतावाद तथा उपकारवाद। किन्तु मनुष्य को भगवद्गीता के उपदेशों से ज्ञान ग्रहण करना चाहिए और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के इस आदेश को स्वीकार करना चाहिए कि मनुष्य विभिन्न नामों से भौतिक सेवा की सारी स्वाभाविक प्रवृत्तियों का परित्याग कर दे और भगवान् की सेवा स्वीकार करे। मनुष्य की आदि स्वाभाविक प्रवृत्ति तो कृष्णभावनामृत के अन्तर्गत कर्म करने की है, क्योंकि मनुष्य का असली स्वभाव आध्यात्मिक है। मनुष्य का कर्तव्य है कि इसे समझे, क्योंकि वह मूलत: आत्मा है, अत: उसे आध्यात्मिक प्रवृत्ति का पालन करना चाहिए और भौतिक प्रवृत्तियों के द्वारा बहकना नहीं चाहिए। इसीलिए श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ने गाया है—
(मिछे) मायार वशे; याच्छा भेसे’ खाच्छा हाबुडुबु, भाइ।

“मेरे भाइयों! तुम लोग भौतिक शक्ति की तरंगों द्वारा ले जाये जा रहे हो और अनेक दुखमय स्थितियों को भोग रहे हो। कभी तुम भौतिक प्रकृति की तरंगों में डूबते हो तो कभी समुद्र में संघर्ष कर रहे तैराक की तरह उछाल दिये जाते हो।” भक्तिविनोद ठाकुर ने ठीक ही कहा है, माया की तरंगों द्वारा थपेड़े खाने की मनुष्य की यह प्रवृत्ति उनकी आदि स्वाभाविक प्रवृत्ति में जो आध्यात्मिक है, बदली जा सकती है , जब जीव यह समझ जाता है कि वह कृष्ण का नित्य दास (कृष्णदास) है।

(जीव) कृष्ण-दास, एइ विश्वास, कर्ले त’ आर दु:ख नाइ विभिन्न नामों से माया की सेवा करने के बजाय यदि मनुष्य अपनी सेवा-प्रवृत्ति को परम भगवान् की ओर मोड़ता है, तो वह सुरक्षित रहता है और फिर कोई कठिनाई नहीं आती। यदि वैदिक वाङ्मय में कृष्ण द्वारा दिये गये पूर्ण ज्ञान को समझकर मनुष्य-जीवन में कोई अपनी आदि स्वाभाविक प्रवृत्ति में लौट आता है, तो उसका जीवन सफल है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥