श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 64

 
श्लोक
तामेव तोषयामास पित्र्येणार्थेन यावता ।
ग्राम्यैर्मनोरमै: कामै: प्रसीदेत यथा तथा ॥ ६४ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—उसको (वेश्या को); एव—निस्सन्देह; तोषयाम् आस—उसने प्रसन्न करने का प्रयास किया; पित्र्येण—अपने पिता की गाढ़ी कमाई से प्राप्त; अर्थेन—धन से; यावता—यथासम्भव; ग्राम्यै:—भौतिक; मन:-रमै:—उसके मन को सुहावना लगने वाले; कामै:—इन्द्रिय भोग के लिए उपहारों द्वारा; प्रसीदेत—उसे तुष्ट करना होगा; यथा—जिससे; तथा—उस तरह से ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह अजामिल अपने पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त जो भी धन था उसे अपने विविध उपहारों द्वारा उस वेश्या को तुष्ट करने में खर्च करने लगा, जिससे वह उससे प्रसन्न बनी रहे। उसने उस वेश्या को तुष्ट करने के लिए अपने सारे ब्राह्मण-कर्म भी छोड़ दिये।
 
तात्पर्य
 विश्व में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें एक शुद्ध व्यक्ति भी वेश्या द्वारा आकृष्ट हो जाने पर उत्तराधिकार में प्राप्त सारा धन खर्च कर देता है। वेश्या का संग इतना निन्दनीय है कि वेश्या के साथ सम्भोग की इच्छा से व्यक्ति अपना चरित्र नष्ट कर सकता है, अपना उच्च पद खो सकता है और अपना सारा धन गँवा सकता है। इसलिए अवैध यौन का पुरजोर निषेध किया गया है। मनुष्य
को अपनी विवाहिता पत्नी से तुष्ट रहना चाहिए, क्योंकि थोड़े से विचलन से ही सर्वनाश हो सकता है। एक कृष्णभावनाभावित गृहस्थ को इसका सदैव स्मरण रहना चाहिए। उसे एक पत्नी से सदैव तुष्ट रहना चाहिए और केवल हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करके शान्त रहना चाहिए। अन्यथा किसी भी क्षण वह अपने उत्तम पद से नीचे गिर सकता है, जिसका ज्वलन्त उदाहरण अजामिल है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥