श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 65

 
श्लोक
विप्रां स्वभार्यामप्रौढां कुले महति लम्भिताम् ।
विससर्जाचिरात्पाप: स्वैरिण्यापाङ्गविद्धधी: ॥ ६५ ॥
 
शब्दार्थ
विप्राम्—ब्राह्मण की पुत्री; स्व-भार्याम्—अपनी पत्नी को; अप्रौढाम्—अधिक आयु वाली नहीं (युवती); कुले—परिवार से; महति—अतीव सम्माननीय; लम्भिताम्—विवाहिता; विससर्ज—त्याग दिया; अचिरात्—तुरन्त ही; पाप:—पापी होने से; स्वैरिण्या—वेश्या की; अपाङ्ग-विद्ध-धी:—कामयुक्त चितवन से बिधी हुई उसकी बुद्धि ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि उसकी बुद्धि वेश्या की कामपूर्ण चितवन से बिंध चुकी थी, अत: शिकार हुआ ब्राह्मण अजामिल उसकी संगति में पापकर्म करने लगा। उसने अपनी अति सुन्दर तरुण पत्नी तक का साथ छोड़ दिया जो अति सम्मानित ब्राह्मण कुल से आई थी।
 
तात्पर्य
 प्रथा के अनुसार हर व्यक्ति अपने पिता का उत्तराधिकार पाने का पात्र है और अजामिल ने भी अपने पिता का धन उत्तराधिकार में पाया। किन्तु उसने इस धन से क्या किया? उसने यह धन कृष्ण
की सेवा में न लगाकर वेश्या की सेवा में लगा दिया। अतएव उसकी निन्दा हुई और वह यमराज द्वारा दण्डनीय हुआ। यह सब कैसे हुआ? वह एक वेश्या की घातक कामयुक्त चितवन का शिकार हो गया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥