श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 8

 
श्लोक
तस्मात्पुरैवाश्विह पापनिष्कृतौ
यतेत मृत्योरविपद्यतात्मना ।
दोषस्य द‍ृष्ट्वा गुरुलाघवं यथा
भिषक् चिकित्सेत रुजां निदानवित् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—इसलिए; पुरा—पहले; एव—निस्सन्देह; आशु—तुरन्त; इह—इस जीवन में; पाप-निष्कृतौ—पापकर्मों के फल से मुक्त बनने के लिए; यतेत—प्रयत्न करे; मृत्यो:—मृत्यु; अविपद्यत—रोग तथा वृद्धावस्था से सताया हुआ नहीं; आत्मना—शरीर से; दोषस्य—पापकर्मों का; दृष्ट्वा—अनुमान करके; गुरु-लाघवम्—भारीपन या हल्कापन; यथा—जिस तरह; भिषक्—वैद्य; चिकित्सेत—उपचार करेगा; रुजाम्—रोग का; निदान-वित्—निदान में निपुण ।.
 
अनुवाद
 
 अत: अगली मृत्यु आने के पूर्व, जब तक मनुष्य का शरीर पर्याप्त सशक्त है, उसे शास्त्रों के अनुसार प्रायश्चित्त की विधि तुरन्त अपनानी चाहिए; अन्यथा समय की क्षति होगी और उसके पापों का फल बढ़ता जायेगा। जिस तरह एक कुशल वैद्य रोग का निदान और उपचार उसकी गम्भीरता के अनुसार करता है, उसी तरह मनुष्य को अपने पापों की गहनता के अनुसार प्रायश्चित्त करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 मनुसंहिता जैसे धार्मिक शास्त्रों में संस्तुति की गई है कि हत्या करने वाले व्यक्ति को फाँसी देनी चाहिए और प्रायश्चित्त में उसके जीवन की बलि दी जानी चाहिए। पहले सारे विश्व में यह पद्धति अपनाई जाती थी, किन्तु नास्तिक बनते जाने के कारण लोग इस प्राणदण्ड को बन्द कर रहे हैं। यह बुद्धिमानी नहीं है। यहाँ पर यह कहा गया है कि जो वैद्य रोग का निदान करना जानता है, वह उसी के अनुसार दवा की संस्तुति करता है। यदि रोग अति गम्भीर हो तो दवा को सशक्त होना चाहिए। हत्यारे के पाप का भार बहुत बड़ा होता है, अतएव मनुसंहिता के अनुसार हत्यारे का वध कर दिया जाना चाहिए। हत्यारे का वध करके सरकार उस पर कृपा करती है, क्योंकि यदि हत्यारे का इसी जीवन में वध नहीं कर दिया जाता
तो अगले जन्मों में उसका अनेक बार वध किया जायेगा और उसे कष्ट भोगने के लिए बाध्य किया जायेगा। चूँकि लोग अगले जीवन तथा प्रकृति की जटिल कार्यशैली के विषय में नहीं जानते, अतएव वे अपने कानून बनाते हैं, किन्तु उन्हें चाहिए कि शास्त्रों द्वारा स्थापित आदेशों का उचित रीति से अवगाहन करें और उन्हीं के अनुसार कर्म करें। भारत में आज भी हिन्दू-समुदाय प्राय: इस विषय में कुशल पंडितों से विचार-विमर्श करता है कि पापकर्मों का निराकरण कैसे किया जाये। ईसाई धर्म में भी पाप कर्म को स्वीकार करने तथा उस का पश्चाताप करने की प्रक्रिया होती है, अतएव प्रायश्चित्त की आवश्यकता पड़ती है और मनुष्य के पापकर्मों की गम्भीरता के अनुसार ही प्रायश्चित्त करना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥