श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 10: देवताओं तथा वृत्रासुर के मध्य युद्ध  »  श्लोक 10

 
श्लोक
अहो दैन्यमहो कष्टं पारक्यै: क्षणभङ्गुरै: ।
यन्नोपकुर्यादस्वार्थैर्मर्त्य: स्वज्ञातिविग्रहै: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
अहो—ओह; दैन्यम्—दीन स्थिति; अहो—ओह; कष्टम्—कोरे कष्ट; पारक्यै:—जो मृत्यु के बाद कुत्ते तथा गीदड़ों के द्वारा भक्ष्य हैं; क्षण-भङ्गुरै:—किसी भी क्षण नष्ट होने वाला; यत्—क्योंकि; न—नहीं; उपकुर्यात्—काम आएगा; अ-स्व- अर्थै:—अपने हित के लिए नहीं; मर्त्य:—जीवात्मा जिसकी मृत्यु ध्रुव है; स्व—अपनी सम्पत्ति; ज्ञाति—परिजनों तथा मित्रों; विग्रहै:—तथा अपने शरीर से ।.
 
अनुवाद
 
 यह शरीर, जिसे मृत्यु के पश्चात् कुत्ते तथा गीदड़ खा जायेंगे, मेरे अपने किसी काम का नहीं है। यह कुछ काल तक ही काम आने वाला है और किसी भी क्षण नष्ट हो सकता है। यह शरीर तथा इसके सभी कुटुम्बी तथा सम्पत्ति परोपकार में लगने चाहिए, अन्यथा वे सब दुख एवं विपत्ति के कारण बनेंगे।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत (१०.२२.३५) में अन्यत्र ऐसा ही उपदेश दिया गया है— एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु।
प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय आचरणं सदा ॥

“यह प्रत्येक जीव का धर्म है कि अपने जीवन, धन, बुद्धि तथा वाणी से अन्यों के हित के लिए शुभ कार्य करे।” यही जीवन का ध्येय है। अपना शरीर तथा अपने मित्रों एवं परिजनों के शरीर तथा अपनी सम्पत्ति एवं जो कुछ भी हो, वह सारा परोपकार में लगा देना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु का यही सन्देश है। श्रीचैतन्य-चरितामृत (आदि ९.४१) में कहा गया है—

भारतभूमिते हैल मनुष्य-जन्म यार।

जन्म सार्थक करि’ कर पर-उपकार ॥

“जिसने इस भारत भूमि में मनुष्य के रूप में जन्म लिया है, उसे चाहिए कि वह अपने जीवन को सफल बनाए और दूसरों के हित के लिए कार्य करे।”

उपकुर्यात् शब्द का अर्थ है पर-उपकार अर्थात् दूसरों की सहायता करना। निस्सन्देह, मानव समाज में ऐसी अनेक संस्थाएँ हैं, जो दूसरों की सहायता करती हैं, किन्तु परोपकारी समाजसेवी यह नहीं जानते कि अन्यों की सहायता किस प्रकार की जाये, अत: उनकी समाजसेवा की लालसा प्रभावशाली नहीं होती। वे जीवन के चरम उद्देश्य (श्रेय आचरणम्) को नहीं जानते, जो परमेश्वर को प्रसन्न करना है। यदि समग्र समाजसेवी तथा मानवतावादी गतिविधियाँ जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने—श्रीभगवान् को प्रसन्न करने—की ओर निर्देशित हों तब वे पूर्ण होंगी। श्रीकृष्ण के बिना कोई भी मानवतावादी कार्य व्यर्थ है। श्रीकृष्ण को प्रत्येक गतिविधि का केन्द्र बनाना होगा, अन्यथा किसी भी गतिविधि का कोई मूल्य नहीं है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥