श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 10: देवताओं तथा वृत्रासुर के मध्य युद्ध  »  श्लोक 15

 
श्लोक
वृत्रमभ्यद्रवच्छत्रुमसुरानीकयूथपै: ।
पर्यस्तमोजसा राजन् क्रुद्धो रुद्र इवान्तकम् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
वृत्रम्—वृत्रासुर पर; अभ्यद्रवत्—आक्रमण किया; शत्रुम्—शत्रु; असुर-अनीक-यूथपै:—असुरों के सैनिकों के सेनापतियों द्वारा; पर्यस्तम्—घिरा हुआ; ओजसा—अत्यन्त वेग से; राजन्—हे राजन्; क्रुद्ध:—क्रोधित होकर; रुद्र:— भगवान् शिव का अवतार; इव—सदृश; अन्तकम्—अन्तक अथवा यमराज ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा परीक्षित! जिस प्रकार रूद्र अत्यन्त क्रुद्ध होकर पहले समय में अन्तक (यमराज) को मारने के लिए उसकी ओर दौड़े थे, उसी प्रकार इन्द्र ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर बड़े ही वेग से आसुरी सेना के नायकों से घिरे वृत्रासुर पर धावा बोल दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥