श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 10: देवताओं तथा वृत्रासुर के मध्य युद्ध  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
तथाभियाचितो देवैर्ऋषिराथर्वणो महान् ।
मोदमान उवाचेदं प्रहसन्निव भारत ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
तथा—इस प्रकार; अभियाचित:—माँगे जाने पर; देवै:—देवताओं के द्वारा; ऋषि:—परम साधु पुरुष; आथर्वण:— अथर्वा के पुत्र, दधीचि ने; महान्—महापुरुष; मोदमान:—प्रसन्न होकर; उवाच—कहा; इदम्—यह; प्रहसन्—हँसते हुए; इव—कुछ-कुछ; भारत—हे महाराज परीक्षित! ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा परीक्षित! भगवान् की आज्ञानुसार देवतागण अथर्वा के पुत्र दधीचि के पास पहुँचे। वे अत्यन्त उदार थे और जब देवताओं ने उनसे शरीर देने के लिए प्रार्थना की तो वे तुरन्त तैयार से हो गये। किन्तु उनसे धार्मिक उपदेश सुनने के उद्देश्य से वे हँसे और विनोद में इस प्रकार बोले।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥