श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 10: देवताओं तथा वृत्रासुर के मध्य युद्ध  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
सर्वे प्रयासा अभवन् विमोघा:
कृता: कृता देवगणेषु दैत्यै: ।
कृष्णानुकूलेषु यथा महत्सु
क्षुद्रै: प्रयुक्ता ऊषती रूक्षवाच: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
सर्वे—समस्त; प्रयासा:—प्रयत्न; अभवन्—हो गये; विमोघा:—निष्फल; कृता:—किया हुआ; कृता:—पुन: किया गया; देव-गणेषु—देवताओं में; दैत्यै:—असुरों द्वारा; कृष्ण-अनुकूलेषु—जो श्रीकृष्ण द्वारा सदैव रक्षित हैं; यथा—जिस प्रकार; महत्सु—वैष्णवों को; क्षुद्रै:—तुच्छ मनुष्यों द्वारा; प्रयुक्ता:—प्रयुक्त; ऊषती:—प्रतिकूल; रूक्ष—कठोर; वाच:—शब्द ।.
 
अनुवाद
 
 जब तुच्छ लोग सन्त पुरुषों पर झूठे, क्रुद्ध आरोप लगाने के लिए दुर्वचनों का व्यवहार करते हैं, तो निरर्थक वचनों से महापुरुष विचलित नहीं होते। इसी प्रकार श्रीकृष्ण द्वारा सुरक्षित देवताओं के विरुद्ध किये जाने वाले असुरों के सभी प्रयास निष्फल हो रहे थे।
 
तात्पर्य
 बाँग्ला में कहावत है, कि गीध के शाप से गाय नहीं मरती। इसी प्रकार कृष्ण के भक्तों पर आसुरी व्यक्तियों द्वारा लगाये जाने वाले आरोपों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। देवता श्रीकृष्ण के भक्त थे, अत: असुरों के शाप निष्फल रहे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥