श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 10: देवताओं तथा वृत्रासुर के मध्य युद्ध  »  श्लोक 30

 
श्लोक
वृत्रोऽसुरांस्ताननुगान् मनस्वी
प्रधावत: प्रेक्ष्य बभाष एतत् ।
पलायितं प्रेक्ष्य बलं च भग्नं
भयेन तीव्रेण विहस्य वीर: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
वृत्र:—वृत्रासुर, असुरों का सेनानायक; असुरान्—सभी असुरों को; तान्—उन; अनुगान्—उसके अनुयायियों को; मनस्वी—विशाल हृदय वाला; प्रधावत:—भागते हुए; प्रेक्ष्य—देखकर; बभाष—बोला; एतत्—यह; पलायितम्—भागते हुए; प्रेक्ष्य—देखकर; बलम्—सेना को; च—तथा; भग्नम्—टूटा हुआ; भयेन—भय से; तीव्रेण—तीव्र; विहस्य— हँसकर; वीर:—बहादुर ।.
 
अनुवाद
 
 अपनी सेना को क्षत-विक्षत तथा समस्त असुरों को, यहाँ तक कि जो परमवीर कहलाते थे, अत्यन्त भय के कारण युद्धभूमि से भागते देखकर सचमुच विशाल हृदय वाला बहादुर वृत्रासुर हँसा और इन शब्दों में बोला।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥