श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 10: देवताओं तथा वृत्रासुर के मध्य युद्ध  »  श्लोक 8

 
श्लोक
योऽध्रुवेणात्मना नाथा न धर्मं न यश: पुमान् ।
ईहेत भूतदयया स शोच्य: स्थावरैरपि ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई; अध्रुवेण—अस्थायी; आत्मना—शरीर से; नाथा:—हे देवो; न—नहीं; धर्मम्—धार्मिक नियम; न—नहीं; यश:—कीर्ति; पुमान्—मनुष्य; ईहेत—के लिए प्रयत्न करता है; भूत-दयया—जीवों के लिए दया से; स:—वह मनुष्य; शोच्य:—शोचनीय; स्थावरै:—जड़ जीवों के द्वारा; अपि—भी ।.
 
अनुवाद
 
 हे देवो! जो न तो दुखी प्राणियों पर दया दिखाता है और न धार्मिक नियमों या अक्षुण्ण कीर्ति के महान् कार्यों के लिए अपने नश्वर शरीर की बलि कर सकता है, वह निश्चय ही जड़ प्राणियों तक के द्वारा धिक्कारा जाता है।
 
तात्पर्य
 इस प्रसंग में भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु तथा वृन्दावन के छ: गोस्वामियों ने एक आदर्श स्थापित किया है। जहाँ तक श्री चैतन्य महाप्रभु का सम्बन्ध है श्रीमद्भागवत (११.५.३४) में कहा गया है कि—
त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम्।

मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावद् वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम् ॥

“हम भगवान् के उन चरणकमलों को नमस्कार करते हैं जिनका मनुष्य को सदैव स्मरण करना चाहिए। उन्होंने अपना गृहस्थ जीवन, यहाँ तक कि अपनी नित्य संगिनी को भी त्याग दिया जिनकी पूजा स्वर्ग के वासी तक करते हैं। वे भौतिक माया के द्वारा मोहग्रस्त पतित आत्माओं के उद्धार के लिए वन में चले गये।” संन्यास ग्रहण करने का अभिप्राय है नागरिक रूप से आत्महत्या, किन्तु संन्यास प्रत्येक ब्राह्मण अर्थात् प्रत्येक प्रथम कोटि के मनुष्य के लिए तो अनिवार्य है। श्री चैतन्य महाप्रभु की पत्नी अत्यन्त तरुणी एवं सुन्दरी थीं और उनकी माता अत्यन्त स्नेहमयी थीं। उनके परिवार के सदस्यों का व्यवहार इतना मधुर था कि देवता भी ऐसे घरेलू सुख की कल्पना नहीं कर सकते थे। फिर भी संसार की सभी पतित आत्माओं के उद्धार के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने चौबीस वर्ष की आयु में गृह त्याग कर संन्यास धारण कर लिया। उन्होंने कठोर संन्यासी का जीवन बिताया और सभी शारीरिक सुखों का त्याग किया। इसी प्रकार उनके छ: गोस्वामी समाज में अच्छे पदों पर मंत्री थे, किन्तु वे सब कुछ त्याग कर श्री चैतन्य महाप्रभु के आन्दोलन में सम्मिलित हो गये। श्रीनिवास आचार्य कहते हैं—

त्यक्त्वा तूर्णमशेषमण्डलपतिश्रेणीं सदा तुच्छवत्।

भूत्वा दीनगणेशकौ करुणया कौपीन कन्थाश्रितौ।

ये गोस्वामी अपने-अपने मंत्री, जमींदार तथा विद्वान पदों को त्याग कर श्री चैतन्य महाप्रभु के आन्दोलन में संसार की पतित-आत्माओं पर अनुग्रह करने के लिए सम्मिलित हो गये (दीन- गणेशकौ करुणया)। उन्होंने भिक्षुकों का जीवन स्वीकार किया, वे केवल लँगोटी तथा फटी गुदड़ी (कंथा) धारण करते हुए वृन्दावन में रहने लगे और श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा का पालन करते थे जिससे वृन्दावन की विगत कीर्ति पुन: खोद सकें।

इसी प्रकार जिन लोगों को सुख-सुविधा प्राप्त है, उन्हें चाहिए कि वे पतित आत्माओं के उद्धार हेतु कृष्णभावनामृत आन्दोलन में सम्मिलित हों। भूतदयया, माया मृगं दयितयेप्सितम् तथा दीन गणेशकौ करुणया इन सभी शब्दों से यही अर्थ निकलता है। ये शब्द उन लोगों के लिए, जो मानव समाज को उचित ज्ञान तक उठाना चाहते हैं, अत्यन्त सार्थक हैं। मनुष्यों को चाहिए कि श्री चैतन्य महाप्रभु, छ: गोस्वामी तथा उनसे भी पूर्व महर्षि दधीचि के आदेशों का अनुकरण करते हुए कृष्णभावनामृत-आन्दोलन में सम्मिलित हों। क्षणिक शारीरिक सुखों के लिए अपने जीवन को व्यर्थ न जाने देकर मनुष्यों को चाहिए कि उसे अच्छे कार्यों में लगाएँ। अन्तत: इस शरीर को नष्ट होना है, अत: मनुष्यों को चाहिए कि इसका उत्सर्ग सारे संसार में धर्म फैलाने के शुभ कार्य में करें।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥