श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  »  श्लोक 11

 
श्लोक
ऐरावतो वृत्रगदाभिमृष्टो
विघूर्णितोऽद्रि: कुलिशाहतो यथा ।
अपासरद् भिन्नमुख: सहेन्द्रो
मुञ्चन्नसृक् सप्तधनुर्भृशार्त: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
ऐरावत:—राजा इन्द्र का हाथी, ऐरावत; वृत्र-गदा-अभिमृष्ट:—वृत्रासुर की गदा के आघात से; विघूर्णित:—चकराकर; अद्रि:—पर्वत; कुलिश—वज्र से; आहत:—प्रताडि़त; यथा—जिस प्रकार; अपासरत्—पीछे हट गया; भिन्न-मुख:—मुँह टूट जाने से; सह-इन्द्र:—इन्द्र सहित; मुञ्चन्—उगलते हुए; असृक्—रक्त; सप्त-धनु:—सात बाणों के तुल्य दूरी (लगभग चौदह गज); भृश—अत्यधिक; आर्त:—व्याकुल ।.
 
अनुवाद
 
 वृत्रासुर की गदा के आघात से ऐरावत हाथी वज्र के द्वारा ताडि़त पर्वत के समान, तीव्र वेदना का अनुभव करता हुआ तथा अपने टूटे मुँह से रक्त उगलता हुआ चौदह गज पीछे छिटक गया। भारी वेदना के कारण वह पीठ पर बैठे इन्द्र के समेत भूमि पर गिर पड़ा।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥