श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
न सन्नवाहाय विषण्णचेतसे
प्रायुङ्क्त भूय: स गदां महात्मा ।
इन्द्रोऽमृतस्यन्दिकराभिमर्श
वीतव्यथक्षतवाहोऽवतस्थे ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; सन्न—थकित; वाहाय—अपने वाहन के हेतु; विषण्ण-चेतसे—अपने चित्त में अत्यन्त खिन्न; प्रायुङ्क्त—चलाया; भूय:—पुन:; स:—उस (वृत्रासुर) ने; गदाम्—गदा; महा-आत्मा—वह महापुरुष (इन्द्र को खिन्न देखकर उस पर गदा न चलाने वाला); इन्द्र:—इन्द्र; अमृत-स्यन्दि-कर—अमृत उत्पन्न करने वाले अपने हाथ के; अभिमर्श—स्पर्श से; वीत— मुक्त; व्यथ—पीड़ा से; क्षत—तथा घाव; वाह:—जिसका वाहन हाथी; अवतस्थे—वहाँ आ खड़ा हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 जब उसने देखा कि इन्द्र-वाहन हाथी थका हुआ एवं घायल है और उसे इस तरह आहत हुआ देखकर इन्द्र स्वयं खिन्न है, तो वह महापुरुष वृत्रासुर धर्म के नियमों का पालन करते हुए इन्द्र पर अपनी गदा से पुन: प्रहार करने से हिचका। इस अवसर का लाभ उठाकर इन्द्र ने अपने अमृतवर्षी हाथ से हाथी को छू दिया जिससे उस पशु की पीड़ा जाती रही और उसके घाव ठीक हो गये। तब हाथी तथा इन्द्र दोनों चुपचाप खड़े हो गए।
 
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥