श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  »  श्लोक 19

 
श्लोक
सुरेश कस्मान्न हिनोषि वज्रं
पुर: स्थिते वैरिणि मय्यमोघम् ।
मा संशयिष्ठा न गदेव वज्र:
स्यान्निष्फल: कृपणार्थेव याच्ञा ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
सुर-ईश—हे देवों के राजा; कस्मात्—क्यों; न—नहीं; हिनोषि—छोड़ते; वज्रम्—वज्र; पुर: स्थिते—तुम्हारे समक्ष खड़ा हुआ; वैरिणि—तुम्हारा शत्रु; मयि—मुझ पर; अमोघम्—न चूकने वाला (वज्र); मा—मत; संशयिष्ठा:—सन्देह करो; न—नहीं; गदा इव—गदा के समान; वज्र:—वज्र; स्यात्—हो सकता है; निष्फल:—बेकार; कृपण—कंजूस व्यक्ति से; अर्था—धन के लिए; इव—सदृश; याच्ञा—याचना ।.
 
अनुवाद
 
 हे स्वर्ग के राजा इन्द्र! तुम अपने समक्ष खड़े अपने शत्रु मुझ पर अपना वज्र क्यों नहीं छोड़ते? यद्यपि गदा द्वारा मुझ पर किया गया तुम्हारा प्रहार निश्चय ही उसी प्रकार निष्फल हो गया था, जिस प्रकार कंजूस से धन की याचना निष्फल होती है, किन्तु तुम्हारे द्वारा धारण किया गया यह वज्र निष्फल नहीं होगा। तुम्हें इस विषय में तनिक भी सन्देह नहीं करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 जब इन्द्र ने अपनी गदा वृत्रासुर पर चलाई थी तो उसने अपने बाएँ हाथ से पकड़ कर उससे इन्द्र के हाथी के सिर पर दे मारा था। इस प्रकार इन्द्र का वह आक्रमण बुरी तरह निष्फल हो गया था। उससे इन्द्र का हाथी घायल हो गया था और चौदह गज पीछे धकेल दिया गया था। अत: इस बार यद्यपि इन्द्र वृत्रासुर पर वज्र छोडऩे जा रहा था, किन्तु उसे सन्देह था कि कहीं गदा के समान यह वज्र भी बेकार न जाये। किन्तु वृत्रासुर ने वैष्णव होने के नाते इन्द्र को यह विश्वास दिलाया कि यह वज्र निष्फल नहीं होगा, क्योंकि वृत्रासुर को ज्ञात था कि भगवान् विष्णु के आदेश से इसे निर्मित किया गया है। यद्यपि इन्द्र को सन्देह था, क्योंकि
वह समझ न सका कि विष्णु की आज्ञा वृथा नहीं जाती, किन्तु वृत्रासुर भगवान् विष्णु के उद्देश्य से परिचित था। वृत्रासुर भगवान् विष्णु के आदेशानुसार निर्मित इस वज्र द्वारा मारे जाने के लिए उत्सुक था, क्योंकि उसे विश्वास था कि इस प्रकार वह भगवान् के धाम वापस जा सकेगा। वह तो केवल अवसर की प्रतीक्षा में था कि कब वज्र छूटे। परिणाम स्वरूप वृत्रासुर ने इन्द्र से कहा, “यदि तुम मुझे अपना शत्रु समझ कर मारना चाहते हो तो इस अवसर का सदुपयोग करो और मुझे मार डालो। तुम्हें विजय मिलेगी और मैं भगवान् के धाम चला जाऊँगा। तुम्हारा कार्य हम दोनों के लिए लाभकर होगा, अत: इसे तुरन्त पूरा करो।”
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥