श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक
विशीर्यमाणां पृतनामासुरीमसुरर्षभ: ।
कालानुकूलैस्त्रिदशै: काल्यमानामनाथवत् ॥ २ ॥
द‍ृष्ट्वातप्यत सङ्‌कुद्ध इन्द्रशत्रुरमर्षित: ।
तान् निवार्यौजसा राजन् निर्भर्त्स्येदमुवाच ह ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
विशीर्यमाणाम्—छिन्न-भिन्न; पृतनाम्—सेना को; आसुरीम्—असुरों की; असुर-ऋषभ:—असुरों में श्रेष्ठ, वृत्रासुर; काल- अनुकूलै:—समय के अनुसार परिस्थितियों का पालन करते हुए; त्रिदशै:—देवताओं के द्वारा; काल्यमानाम्—पीछा किये गये; अनाथ-वत्—असुरक्षित की तरह; दृष्ट्वा—देखकर; अतप्यत—दुखी हुआ; सङ्क्रुद्ध:—अत्यन्त क्रुद्ध होकर; इन्द्र शत्रु:—इन्द्र का वैरी, वृत्रासुर; अमर्षित:—न सह सकने से; तान्—उन (देवताओं) को; निवार्य—रोक कर; ओजसा— अत्यन्त बलपूर्वक से; राजन्—हे राजा परीक्षित; निर्भर्त्स्य—डाँटकर; इदम्—यह; उवाच—कहा; ह—निस्सन्देह ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा परीक्षित! समय द्वारा प्रदत्त अनुकूल अवसर का लाभ उठाकर देवताओं ने असुरों की सेना पर पीछे से आक्रमण कर दिया और असुर सैनिकों को खदेडक़र इधर-उधर बिखेर दिया, मानो उनकी सेना में कोई नायक ही न हो। अपने सैनिकों की दयनीय दशा को देखकर असुरश्रेष्ठ वृत्रासुर जिसे इन्द्रशत्रु कहा जाता था, अत्यन्त दुखी हुआ। ऐसी पराजय न सह सकने के कारण उसने देवताओं को रोका और बलपूर्वक डाँटते हुए क्रुद्धभाव से इस प्रकार कहा।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥