श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  »  श्लोक 22

 
श्लोक
पुंसां किलैकान्तधियां स्वकानां
या: सम्पदो दिवि भूमौ रसायाम् ।
न राति यद्‌द्वेष उद्वेग आधि-
र्मद: कलिर्व्यसनं सम्प्रयास: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
पुंसाम्—मनुष्यों को; किल—निश्चय ही; एकान्त-धियाम्—आध्यात्मिक चेतना में उन्नत; स्वकानाम्—श्रीभगवान् के अपने; या:—जो; सम्पद:—ऐश्वर्य; दिवि—स्वर्गलोक में; भूमौ—मध्यलोक में; रसायाम्—तथा अध: लोकों में; न— नहीं; राति—प्रदान करता है; यत्—जिससे; द्वेष:—द्वेष, ईर्ष्या; उद्वेग:—चिन्ता; आधि:—मानसिक क्षोभ; मद:—घमंड; कलि:—कलह; व्यसनम्—हानि के कारण उत्पन्न दुख; सम्प्रयास:—महान् प्रयत्न ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीभगवान् के चरणारविन्द में जो व्यक्ति पूर्णतया समर्पित होते हैं और निरन्तर उनके चरणारविन्द का चिन्तन करते हैं, उन्हें भगवान् अपने पार्षदों या सेवकों के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। भगवान् ऐसे सेवकों को उच्च, मध्य तथा निम्न लोकों का आकर्षक ऐश्वर्य प्रदान नहीं करते, क्योंकि जब उन्हें इन लोकों में से किसी एक की भी प्राप्ति हो जाती है, तो उससे शत्रुता, चिन्ता, मानसिक क्षोभ, अभिमान तथा कलह की वृद्धि होती है। इस प्रकार मनुष्य को अपनी सम्पत्ति को बढ़ाने और उसको बनाये रखने में काफी प्रयास करना पड़ता है और जब सम्पत्ति की क्षति हो जाती है, तो उसे भारी दुख होता है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (४.११) में भगवान् का कथन है—
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ॥

“जो जिस भाव से मेरी शरण लेते हैं, उसी के अनुरूप मैं उन्हें फल देता हूँ। हे पार्थ! प्रत्येक मनुष्य सब प्रकार से मेरे पथ का अनुगमन करता है।” इन्द्र तथा वृत्रासुर दोनों निश्चय ही भगवान् के भक्त थे, यद्यपि इन्द्र ने वृत्रासुर को मारने के लिए भगवान् विष्णु का आदेश ले रखा था। वास्तव में वृत्रासुर के प्रति भगवान् अत्यन्त कृपालु थे, क्योंकि इन्द्र के वज्र से वृत्रासुर के मारे जाने पर वह भगवान् के धाम पहुँचेगा जबकि विजयी इन्द्र को इसी संसार में सडऩा पड़ेगा। चूँकि दोनों भक्त थे, अत: भगवान् ने उनकी इच्छानुसार उन्हें वरदान दिए। वृत्रासुर ने कभी भौतिक सम्पत्ति की कामना नहीं की, क्योंकि उसे इसकी नियति का पता था। सम्पत्ति एकत्र करने के लिए मनुष्य को काफी श्रम करना पड़ता है और उसके प्राप्त होने पर अनेक शत्रु उत्पन्न हो जाते हैं, क्योंकि यह संसार प्रतिद्वंद्विता से ओतप्रोत है। यदि कोई धनी हो जाता है, तो उसके मित्र तथा परिजन उससे ईर्ष्या करने लगते हैं। अत: एकान्त भक्तों को श्रीकृष्ण भौतिक सम्पत्ति प्रदान नहीं करते। कभी- कभी भक्त को उपदेश कार्य के लिए कुछ धन की आवश्यकता होती है, किन्तु प्रचारक की सम्पत्ति कर्मी के समान नहीं होती। कर्मी का धन कर्म के फलस्वरूप प्राप्त किया जाता है, किन्तु भक्तों के धन की श्रीभगवान् द्वारा व्यवस्था की जाती है, जिससे वे भक्ति के लिए कार्य कर सकें। चूँकि भक्त भगवान् की सेवा के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य के लिए भौतिक धन का प्रयोग नहीं करता, अत: भक्त के धन की तुलना कर्मी के धन से नहीं की जानी चाहिए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥