श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् ।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्‌क्षे ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; नाक-पृष्ठम्—स्वर्गलोक या ध्रुवलोक; न—न तो; च—भी; पारमेष्ठ्यम्—जिस लोक में ब्रह्मा रहते हैं; न—न तो; सार्व-भौमम्—समस्त पृथ्वी लोकों पर एकाधिपत्य; न—नहीं; रसा-आधिपत्यम्—अधोलोकों का स्वामित्व; न— नहीं; योग-सिद्धी:—आठ प्रकार की यौगिक शक्तियाँ (अणिमा, लघिमा, महिमा इत्यादि) ; अपुन:-भवम्—पुनर्जन्म से छुटकारा; वा—अथवा; समञ्जस—हे समस्त अवसरों के स्रोत; त्वा—तुम से; विरहय्य—से पृथक् किया हुआ; काङ्क्षे— कामना करता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे समस्त सौभाग्य के स्रोत भगवान्! मुझे न तो ध्रुवलोक में, न स्वर्ग में अथवा ब्रह्मलोक में सुख भोगने की इच्छा है और न ही मैं समस्त भू-लोकों अथवा अध:लोकों का सर्वोच्च अधिपति बनना चाहता हूँ। मैं योग शक्तियों का स्वामी भी नहीं बनना चाहता, न ही आपके चरणकमलों को त्याग कर मोक्ष की कामना करता हूँ।
 
तात्पर्य
 शुद्ध भक्त कभी-भी भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा करके भौतिक सौभाग्य की इच्छा नहीं करता। वह तो भगवान् तथा उनके पार्षदों की निरन्तर संगति में रह कर भगवान् की प्रेममयी सेवा में लगा रहना चाहता है, जैसाकि पिछले श्लोक में वर्णन हुआ है (दासानुदासो भवितास्मि)। इसकी पुष्टि नरोत्तमदास ठाकुर ने की है—

तांदेर चरण सेवि भक्तसने वास।

जनमे जनमे हय, एइ अभिलाष ॥

शुद्ध भक्त की यही अभिलाषा रहती है कि वह भक्तों की संगति में रहकर भगवान् तथा उनके दासानुदासों की सेवा करता रहे।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥