श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
अजातपक्षा इव मातरं खगा:
स्तन्यं यथा वत्सतरा: क्षुधार्ता: ।
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा
मनोऽरविन्दाक्ष दिद‍ृक्षते त्वाम् ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
अजात-पक्षा:—जिनके अभी तक पंख नहीं उगे; इव—सदृश; मातरम्—माता; खगा:—छोटे पक्षी; स्तन्यम्—स्तन का दूध; यथा—जिस प्रकार; वत्सतरा:—बछड़े; क्षुध्-आर्ता:—भूख से पीडि़त; प्रियम्—प्रिय या पति; प्रिया—पत्नी या प्रेमिका; इव—सदृश; व्युषितम्—प्रवासी, घर से दूर; विषण्णा—दुखी; मन:—मेरा मन; अरविन्द-अक्ष—हे कमल नेत्र वाले; दिदृक्षते—देखना चाहता है; त्वाम्—तुमको ।.
 
अनुवाद
 
 हे कमलनयन भगवान्! जैसे पक्षियों के पंखविहीन बच्चे अपनी माँ के लौटने तथा खिलाये जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं, जैसे रस्सियों से बँधे छोटे-छोटे बछड़े गाय दुहे जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं जिससे उन्हें अपनी माताओं का दूध पीने को मिले या जैसे वियोगिनी पत्नी घर से दूर वसे अपने प्रवासी पति के लौटने तथा सभी प्रकार से तुष्ट किये जाने के लिए लालायित रहती है, उसी प्रकार मैं आपकी प्रत्यक्ष सेवा करने के अवसर पाने के लिए सदैव उत्कण्ठित रहता हूँ।
 
तात्पर्य
 शुद्ध भक्त की अभिलाषा रहती है कि वह स्वयं भगवान् के निकट पहुँचकर उनकी सेवा करे। यहाँ पर जो उदाहरण दिये गये हैं, वे सर्वथा उपयुक्त हैं। पक्षी के छोटे-छोटे बच्चे तब तक संतुष्ट नहीं होते जब तक उनकी माँ स्वयं आकर उन्हें दाना नहीं खिलाती, एक बछड़ा तब तक प्रसन्न नहीं होता जब तक उसे अपनी माँ के थन का दूध पीने नहीं दिया जाता तथा पतिव्रता पत्नी, जिसका पति विदेश गया होता है, तब तक प्रसन्न नहीं होती जब तक अपने प्रिय पति से उसका मिलन नहीं हो जाता।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥