श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  »  श्लोक 5

 
श्लोक
यदि व: प्रधने श्रद्धा सारं वा क्षुल्लका हृदि ।
अग्रे तिष्ठत मात्रं मे न चेद ग्राम्यसुखे स्पृहा ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
यदि—यदि; व:—तुम सबका; प्रधने—युद्ध में; श्रद्धा—विश्वास; सारम्—धैर्य; वा—अथवा; क्षुल्लका:—हे नीचो; हृदि—हृदय में; अग्रे—सामने; तिष्ठत—जरा ठहरो; मात्रम्—एक क्षण के लिए; मे—मेरे; न—नहीं; चेत्—यदि; ग्राम्य सुखे—इन्द्रियतृप्ति में; स्पृहा—आकांक्षा ।.
 
अनुवाद
 
 हे तुच्छ देवो! यदि तुम्हें अपनी वीरता में सचमुच विश्वास है, यदि तुम्हारे अन्तस्थल में धैर्य है और यदि तुम इन्द्रियतृप्ति के कामी नहीं हो, तो क्षण भर मेरे समक्ष ठहरो।
 
तात्पर्य
 देवताओं को डाँटते हुए वृत्रासुर ने ललकारा, “अरे देवो! यदि तुम सचमुच वीर हो तो अब मेरे सामने ठहरो और अपना शौर्य दिखाओ। यदि तुम लडऩा नहीं चाहते, यदि तुम अपने प्राणों से भयभीत हो तो मैं तुम्हें
मारूँगा नहीं, क्योंकि मैं तुम्हारी तरह दुष्ट प्रकृति का नहीं हूँ कि ऐसे पुरुषों का वध करूँ जो न तो वीर हैं और न लडऩा चाहते हैं। यदि तुम्हें अपनी शूरता में विश्वास है, तो मेरे समक्ष ठहरो।”
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥