श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  » 
 
 
 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में वृत्रासुर के सद्गुणों का वर्णन हुआ है। जब वृत्रासुर की सेना के प्रमुख सेनानायक वृत्रासुर के उपदेश को न सुनकर भाग गये तो उसने उन्हें कायर कह कर खूब धिक्कारा। वीरतापूर्वक बोलते हुए वह देवताओं का सामना करने के लिए अकेला अड़ा रहा। जब देवताओं ने वृत्रासुर के रुख को देखा तो वे इतने भयभीत हुए कि मूर्च्छित-से होने लगे और वृत्रासुर उन्हें रौंदने लगा। इन्द्र इसे सहन न कर सका, अत: उसने अपनी गदा वृत्रासुर पर चलाई लेकिन वृत्रासुर इतना वीर था कि उसने अपने बाएँ हाथ से गदा पकड़ ली और उससे इन्द्र के हाथी को मारने लगा। वृत्रासुर के प्रहार से वह हाथी चौदह गज पीछे हट गया और पीठ पर बैठे इन्द्र समेत भूमि पर गिर पड़ा।
राजा इन्द्र ने पहले विश्वरूप को पुरोहित बनाया और बाद में उसका वध कर दिया था। वृत्रासुर ने इन्द्र को इस जघन्य कार्य की याद दिलाते हुए कहा, “यदि कोई श्रीभगवान् विष्णु का भक्त होता है और हर प्रकार से भगवान् विष्णु पर निर्भर रहता है, तो उसे विजय, ऐश्वर्य तथा मानसिक शान्ति—ये अनिवार्य रूप से उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे मुनष्य को तीनों लोकों में किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं रह जाती। परमेश्वर इतने दयालु हैं कि वे जानबूझ कर ऐसे भक्त को ऐश्वर्य नहीं देते जिससे उसकी भक्ति में व्यवधान पड़े। अत: मैं भगवान् की सेवा करने के लिए सब कुछ त्याग देना चाहता हूँ। मैं सदा भगवान् का गुणगान करना चाहता हूं और उनकी सेवा में लगा रहना चाहता हूँ। मैं अपने सांसारिक परिवार से विरक्त होकर भगवान् के भक्तों की संगति करूँगा। मैं किसी उच्च लोक, यहाँ तक कि ध्रुवलोक या ब्रह्मलोक में भेजे जाने की कामना भी नहीं करता, न ही मैं इस जगत में अविजित स्थिति का भूखा हूँ। मुझे ऐसी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है।”
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥