श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 12: वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु  »  श्लोक 11

 
श्लोक
पुरुष: प्रकृतिर्व्यक्तमात्मा भूतेन्द्रियाशया: ।
शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहात् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
पुरुष:—समस्त भौतिक शक्ति का जनक; प्रकृति:—भौतिक शक्ति या भौतिक प्रकृति; व्यक्तम्—अभिव्यक्ति के सिद्धान्त (महत् तत्त्व); आत्मा—मिथ्या अहंकार; भूत—पाँच भौतिक तत्त्व; इन्द्रिय—दस इन्द्रियाँ; आशया:—मन, बुद्धि तथा चेतना; शक्नुवन्ति—समर्थ हैं; अस्य—इस ब्रह्माण्ड के; सर्ग-आदौ—सृष्टि इत्यादि में.; न—नहीं; विना—रहित; यत्— जिसकी; अनुग्रहात्—कृपा से ।.
 
अनुवाद
 
 तीनों पुरुष—कारणोदकशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु तथा क्षीरोदकशायी विष्णु—भौतिक प्रकृति, समग्र भौतिक शक्ति (महत् तत्त्व), मिथ्या अहंकार, पाँचों भौतिक तत्त्व, भौतिक इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा चेतना, ये सब भगवान् के आदेश के बिना भौतिक जगत की सृष्टि नहीं कर सकते।
 
तात्पर्य
 जैसाकि विष्णु पुराण में पुष्टि की गई है—परस्य ब्रह्मण: शक्तिस्तथेदम् अखिलं जगत्—हम जितनी भी अभिव्यक्तियों का अनुभव करते हैं, वे भगवान् की शक्तियाँ के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। ये शक्तियाँ स्वतंत्र रूप से कुछ भी उत्पन्न नहीं कर सकतीं। इसकी पुष्टि भी स्वयं भगवान् ने भगवद्गीता (९.१०) में इस प्रकार की है—मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्—
“हे कुन्तीपुत्र! यह भौतिक प्रकृति मेरे निर्देश से कार्यशील है और समस्त जड़-चेतन प्राणियों को उत्पन्न कर रही है।” केवल श्रीभगवान् की अध्यक्षता में प्रकृति, जो चौबीस तत्त्वों के रूप में प्रकट होती है, जीवात्मा के लिए विभिन्न स्थितियाँ उत्पन्न करती हैं। वेदों में भगवान् का कथन है— मदीयं महिमानं च परब्रह्मेति शब्दितम्।

वेत्स्यस्यनुगृहीतं मे सम्प्रश्नैर्विवृतं हृदि ॥

“चूँकि प्रत्येक वस्तु मेरी शक्ति का प्राकट्य है, इसलिए मुझे परब्रह्म के रूप में जाना जाता है। इसलिए प्रत्येक प्राणी को मुझसे मेरे अपने महिमामय कार्यों के बारे में सुनना चाहिए।” भगवद्गीता (१०.२) में भी भगवान् ने कहा है—अहं आदिर्हि देवानाम्—“मैं समस्त देवताओं का मूल हूँ।” अत: श्रीभगवान् प्रत्येक वस्तु के मूल (आदि) हैं और कोई भी उनसे स्वतंत्र नहीं है। श्रील मध्वाचार्य भी कहते हैं—अनीशजीव रूपेण—जीवात्मा अनीश होता है, वह नियामक कभी नहीं होता, वह सदैव अधीनस्थ रहता है। अत: जब कोई जीवात्मा स्वतंत्र ईश्वर या भगवान् होने का अभिमान दिखाता है, तो इसे उसकी मूर्खता समझनी चाहिए। ऐसी मूर्खता का वर्णन अगले श्लोक में हुआ है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥