श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 12: वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु  »  श्लोक 13

 
श्लोक
आयु: श्री: कीर्तिरैश्वर्यमाशिष: पुरुषस्य या: ।
भवन्त्येव हि तत्काले यथानिच्छोर्विपर्यया: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
आयु:—दीर्घजीविता; श्री:—ऐश्वर्य; कीर्ति:—यश; ऐश्वर्यम्—शक्ति; आशिष:—आशीर्वाद, वर; पुरुषस्य—जीवात्मा का; या:—जो; भवन्ति—होते हैं; एव—निस्सन्देह; हि—निश्चय ही; तत्-काले—ठीक समय पर; यथा—जिस प्रकार; अनिच्छो:—न चाहने वाले का; विपर्यया:—विपरीत परिस्थितियाँ ।.
 
अनुवाद
 
 जिस प्रकार मरने की इच्छा न रखने पर भी मनुष्य को मृत्यु के समय अपनी आयु, ऐश्वर्य, यश तथा अन्य सब कुछ त्याग देना पड़ता है उसी प्रकार जब ईश्वर की कृपा होती है, तो विजय के नियत समय के अनुकूल होने पर ये सारी वस्तुएँ उसे मिल जाती हैं।
 
तात्पर्य
 झूठे में फूले न समाना उचित नहीं, यदि कोई यह कहे कि वह अपने प्रयास से ऐश्वर्यवान, विद्वान, रूपवान् आदि बन सका है। ऐसा सौभाग्य ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त होता है। एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार, न तो कोई मरना चाहता है, न कोई निर्धन या कुरूप होना चाहता है। तो फिर जीव को अपनी मर्जी के विरूद्ध ऐसे अनिच्छित कष्ट क्यों मिलते हैं? यह परमेश्वर की कृपा या ताडऩा का ही फल है कि मनुष्य को भौतिक लाभ या हानि होती है। कोई स्वतंत्र नहीं है, प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर की कृपा या ताडऩा के अधीन है। बँगला में एक सामान्य कहावत है कि भगवान् के दस हाथ होते हैं। इसका अर्थ यह है कि उनका सर्वत्र नियंत्रण
है—आठों दिशाओं में तथा ऊपर और नीचे। यदि वे अपने दस हाथों से हमसे सब कुछ छीन लेना चाहते हैं, तो हम अपने दो हाथों से कुछ भी नहीं बचा सकते। इसी प्रकार यदि वे अपने दसों हाथों से हमें आशीष देना चाहें तो हम अपने दो हाथों से यह सब कुछ कैसे प्राप्त कर सकेंगे? दूसरें शब्दों में आशीष- समूह हमारी इच्छाओं से बढक़र है। यद्यपि हम अपनी सम्पत्ति से विलग नहीं होना चाहते, निष्कर्ष यह है कि कभी-कभी भगवान् उसे बलपूर्वक हमसे छीन लेते हैं और कभी वे हमको इतने वर देते है कि हम उन सबको ग्रहण नहीं कर सकते। अत: चाहे सुख हो या दुख, हम स्वतंत्र नहीं हैं; सब कुछ श्रीभगवान् की परम इच्छा पर निर्भर करता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥