श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 12: वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु  »  श्लोक 17

 
श्लोक
प्राणग्लहोऽयं समर इष्वक्षो वाहनासन: ।
अत्र न ज्ञायतेऽमुष्य जयोऽमुष्य पराजय: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
प्राण-ग्लह:—प्राणों की बाजी; अयम्—यह; समर:—युद्ध; इषु-अक्ष:—तीर रूपी पाँसे; वाहन-आसन:—हाथी तथा घोड़े जैसे वाहन चौसर हैं; अत्र—यहाँ (इस जुएँ के खेल में); न—नहीं; ज्ञायते—ज्ञात है; अमुष्य—उस एक की; जय:— विजय; अमुष्य—अमुक की; पराजय:—हार ।.
 
अनुवाद
 
 अरे मेरे शत्रु! इस युद्ध को द्यूतक्रीड़ा का खेल मानो जिसमें हमारे प्राणों की बाजी लगी है, बाण पासे हैं और वाहक पशु चौसर हैं। कोई नहीं जानता कि कौन हारेगा और कौन जीतेगा। यह सब विधाता पर निर्भर है।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥