श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 12: वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु  »  श्लोक 23

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
इति ब्रुवाणावन्योन्यं धर्मजिज्ञासया नृप ।
युयुधाते महावीर्याविन्द्रवृत्रौ युधाम्पती ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति—इस प्रकार; ब्रुवाणौ—बोलते हुए; अन्योन्यम्—परस्पर; धर्म जिज्ञासया—परम धार्मिक नियम (भक्तियोग) जानने की इच्छा से; नृप—हे राजन्; युयुधाते—युद्ध किया; महा-वीर्यौ— दोनों वीर; इन्द्र—राजा इन्द्र; वृत्रौ—तथा वृत्रासुर ने; युधाम् पती—दोनों महान् सेनानायक ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा—वृत्रासुर तथा राजा इन्द्र ने युद्धभूमि में भी भक्तियोग के सम्बन्ध में बातें कीं और अपना कर्तव्य समझकर दोनों पुन: युद्ध में भिड़ गये। हे राजन्! दोनों ही बड़े योद्धा और समान रूप से शक्तिशाली थे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥