श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 12: वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु  »  श्लोक 25

 
श्लोक
स तु वृत्रस्य परिघं करं च करभोपमम् ।
चिच्छेद युगपद्देवो वज्रेण शतपर्वणा ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
स:—उस (राजा इन्द्र) ने; तु—फिर भी; वृत्रस्य—वृत्रासुर का; परिघम्—लोहे का परिघ; करम्—उसका हाथ; च— तथा; करभ-उपमम्—हाथी के सूँड़ के समान बली; चिच्छेद—खण्ड खण्ड कर दिया; युगपत्—एकसाथ; देव:— श्रीइन्द्र; वज्रेण—वज्र से; शत-पर्वणा—एक सौ जोड़ों वाले ।.
 
अनुवाद
 
 इन्द्र ने अपने शतपर्वन नामक वज्र से वृत्रासुर के परिघ तथा उसके बचे हुए हाथ को एक साथ खण्ड-खण्ड कर डाला।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥