श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 12: वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु  »  श्लोक 31

 
श्लोक
निगीर्णोऽप्यसुरेन्द्रेण न ममारोदरं गत: ।
महापुरुषसन्नद्धो योगमायाबलेन च ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
निगीर्ण:—निगला जाकर; अपि—यद्यपि; असुर-इन्द्रेण—असुरों में श्रेष्ठ, वृत्रासुर द्वारा; न—नहीं; ममार—मरा; उदरम्— उदर में; गत:—जाकर; महा-पुरुष—परमेश्वर नारायण के कवच से; सन्नद्ध:—सुरक्षित रहकर; योग-माया-बलेन—इन्द्र की अपनी योगशक्ति से; च—भी ।.
 
अनुवाद
 
 इन्द्र के पास नारायण का जो सुरक्षा कवच था, वह स्वयं भगवान् नारायण से अभिन्न था। उस कवच के द्वारा तथा अपनी योगशक्ति से सुरक्षित होने पर राजा इन्द्र वृत्रासुर द्वारा निगले जाने पर भी उस असुर के उदर में मरा नहीं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥