श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 12: वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु  »  श्लोक 35

 
श्लोक
वृत्रस्य देहान्निष्क्रान्तमात्मज्योतिररिन्दम ।
पश्यतां सर्वदेवानामलोकं समपद्यत ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
वृत्रस्य—वृत्रासुर के; देहात्—शरीर से; निष्क्रान्तम्—निकली हुई; आत्म-ज्योति:—आत्मा, जो ब्रह्म तेज के समान प्रकाशमान था; अरिम्-दम—शत्रुओं का दमन करने वाले हे राजा परीक्षित; पश्यताम्—देख रहे थे; सर्व-देवानाम्—जब सभी देवता; अलोकम्—ब्रह्मतेज से पूरित, परम धाम; समपद्यत—प्राप्त किया ।.
 
अनुवाद
 
 हे शत्रुओं का दमन करने वाले राजा परीक्षित! तब वृत्रासुर के शरीर से सजीव ज्योति निकल कर बाहर आई और भगवान् के परम धाम को लौट गई। सभी देवताओं के देखते देखते वह भगवान् संकर्षण का संगी बनने के लिए दिव्य लोक में प्रविष्ट हुआ।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने व्याख्या की है कि वास्तव में वृत्रासुर नहीं, अपितु इन्द्र मारा गया था। वे लिखते हैं कि जब वृत्रासुर ने हाथी समेत इन्द्र को निगल लिया तो उसने सोचा कि मैंने तो इन्द्र को मार डाला, अत: अब लडऩे की कोई आवश्यकता नहीं है, अब मुझे भगवान् के परम धाम जाना है। इस प्रकार सोचते हुए उसने सारे शरीरिक कार्य-कलाप बन्द कर दिये और समाधि धारण कर ली। वृत्रासुर के शरीर की मौनावस्था का लाभ उठाकर इन्द्र ने असुर का पेट फाड़ डाला और वृत्रासुर की समाधि के कारण बाहर निकल आया।
चूँकि वृत्रासुर योग-समाधि में लीन था, अत: यद्यपि इन्द्र उसकी गर्दन काट लेना चाहता था, किन्तु वह इतनी कठोर हो चुकी थी कि उसे खण्ड-खण्ड करने में इन्द्र को पूरे ३६० दिन लग गये। वास्तव में इन्द्र ने वृत्रासुर के उस शरीर के खण्ड-खण्ड किये जिसको उसने स्वयं त्याग दिया था; स्वयं वृत्रासुर नहीं मारा गया। वृत्रासुर अपनी आदि (मूल) चेतना में ही भगवान् संकर्षण का संगी बनने के लिए भगवान् के परम धाम चला गया। यहाँ पर अलोकम् शब्द दिव्यलोक, वैकुण्ठलोक को बताता है, जहाँ संकर्षण नित्य निवास करते हैं।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के छठे स्कंन्ध के अन्तर्गत “वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु” नामक बारहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥