श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 13: ब्रह्महत्या से पीडि़त राजा इन्द्र  »  श्लोक 14

 
श्लोक
नभो गतो दिश: सर्वा: सहस्राक्षो विशाम्पते ।
प्रागुदीचीं दिशं तूर्णं प्रविष्टो नृप मानसम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
नभ:—आकाश को; गत:—जाकर; दिश:—दिशाओं को; सर्वा:—समस्त; सहस्र-अक्ष:—इन्द्र, जिसके एक हजार आँखें हैं; विशाम्पते—हे राजा; प्राक्-उदीचीम्—उत्तरपूर्व; दिशम्—दिशा में; तूर्णम्—अत्यन्त वेग से; प्रविष्ट:—प्रवेश किया; नृप—हे राजा; मानसम्—मानस-सरोवर नामक झील में ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्! इन्द्र पहले आकाश की ओर भागा, किन्तु उसने वहाँ भी उस ब्रह्महत्या रूपिणी स्त्री को अपना पीछा करते देखा। जहाँ कहीं भी वह गया, यह डायन उसका पीछा करती रही। अन्त में वह तेजी से उत्तरपूर्व की ओर गया और मानस सरोवर में घुस गया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥