श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 13: ब्रह्महत्या से पीडि़त राजा इन्द्र  »  श्लोक 17

 
श्लोक
ततो गतो ब्रह्मगिरोपहूत
ऋतम्भरध्याननिवारिताघ: ।
पापस्तु दिग्देवतया हतौजा-
स्तं नाभ्यभूदवितं विष्णुपत्‍न्या ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; गत:—चले गये; ब्रह्म—ब्राह्मणों के; गिरा—शब्दों से; उपहूत:—आमंत्रित होकर; ऋतम्भर—सत्य का पोषण करने वाले परमेश्वर में; ध्यान—ध्यान द्वारा; निवारित—रोका जाकर; अघ:—जिसका पाप; पाप:—पाप-पूर्ण कर्म; तु—तब; दिक्-देवतया—रुद्रदेव द्वारा; हत-ओजा:—समस्त शौर्य के क्षीण होने पर; तम्—उस (इन्द्र) को; न अभ्यभूत्—परास्त नहीं कर सका; अवितम्—सुरक्षित होने से; विष्णु-पत्न्या—धन की देवी, भगवान् विष्णु की पत्नी द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 समस्त दिशाओं के देवता रुद्र के प्रताप से इन्द्र के पाप कम हो गये। चूँकि इन्द्र की रक्षा मानस-सरोवर के कमल कुंजों में निवास करने वाली धन की देवी भगवान् विष्णु की पत्नी द्वारा की जा रही थी, अत: इन्द्र के पापों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अन्त में भगवान् विष्णु की निष्ठा-पूर्वक पूजा करने से इन्द्र के सारे पाप छूट गये। तब ब्राह्मणों ने उसे पुन: स्वर्गलोक में बुलाकर उसके पूर्व पद पर स्थापित कर दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥