श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 13: ब्रह्महत्या से पीडि़त राजा इन्द्र  »  श्लोक 19-20

 
श्लोक
अथेज्यमाने पुरुषे सर्वदेवमयात्मनि ।
अश्वमेधे महेन्द्रेण वितते ब्रह्मवादिभि: ॥ १९ ॥
स वै त्वाष्ट्रवधो भूयानपि पापचयो नृप ।
नीतस्तेनैव शून्याय नीहार इव भानुना ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
अथ—अत:; इज्यमाने—पूजित होकर; पुरुषे—श्रीभगवान्; सर्व—समस्त; देव-मय-आत्मनि—परमात्मा तथा देवताओं के पालक; अश्वमेधे—अश्वमेध यज्ञ के माध्यम से; महा-इन्द्रेण—राजा इन्द्र द्वारा; वितते—सम्पन्न कराया गया; ब्रह्म वादिभि:—वैदिक ज्ञान में दक्ष ऋषियों तथा ब्राह्मणों द्वारा; स:—वह; वै—निस्सन्देह; त्वाष्ट्र-वध:—त्वष्टा के पुत्र वृत्रासुर का वध; भूयात्—हो; अपि—यद्यपि; पापचय:—पाप समूह; नृप—हे राजा; नीत:—लाया गया; तेन—उस (अश्वयज्ञ) के द्वारा; एव—निश्चय ही; शून्याय—शून्य, कुछ नहीं; नीहार:—कोहरा; इव—सदृश; भानुना—तेजमय सूर्य के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 ऋषितुल्य ब्राह्मणों द्वारा सम्पन्न किये गये अश्वमेध यज्ञ ने इन्द्र को समस्त पाप-बन्धनों से मुक्त कर दिया, क्योंकि उस यज्ञ में उसने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा की थी। हे राजन्! यद्यपि उसने गम्भीर पापकृत्य किया था, किन्तु उस यज्ञ से वह पाप कृत्य तुरन्त उसी प्रकार विनष्ट हो गया, जिस प्रकार सूर्य के तेज प्रकाश से कोहरा छँट जाता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥