श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 13: ब्रह्महत्या से पीडि़त राजा इन्द्र  »  श्लोक 3

 
श्लोक
श्रीराजोवाच
इन्द्रस्यानिर्वृतेर्हेतुं श्रोतुमिच्छामि भो मुने ।
येनासन् सुखिनो देवा हरेर्दु:खं कुतोऽभवत् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-राजा उवाच—राजा परीक्षित ने पूछा; इन्द्रस्य—इन्द्र का; अनिर्वृते:—दुख का; हेतुम्—कारण; श्रोतुम्—सुनना; इच्छामि—चाहता हूँ; भो:—हे भगवान्; मुने—हे मुनि शुकदेव गोस्वामी; येन—जिससे; आसन्—थे; सुखिन:—अत्यन्त प्रसन्न; देवा:—समस्त देवता; हरे:—इन्द्र का; दु:खम्—दुख, अप्रसन्नता; कुत:—कहाँ से; अभवत्—था ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा—हे मुनि! इन्द्र की अप्रसन्नता का कारण क्या था? मैं इसके विषय में सुनना चाहता हूँ। जब उसने वृत्रासुर का वध कर दिया तो सभी देवता प्रसन्न हुए, तो फिर इन्द्र स्वयं क्यों अप्रसन्न था?
 
तात्पर्य
 वास्तव में यह अत्यन्त बुद्धिमत्तापूर्ण प्रश्न है। जब कोई असुर मारा जाता है, तो निश्चित रूप से सभी देवता प्रसन्न होते हैं। यहाँ पर, वृत्रासुर के मारे जाने पर सभी देवता प्रसन्न थे, परन्तु इन्द्र अप्रसन्न था, क्योंकि उसे पता था कि उसने एक परम भक्त तथा ब्राह्मण का वध किया है। वृत्रासुर बाहर से असुर प्रतीत होता था, किन्तु भीतर से वह परम भक्त होने के कारण एक महान् ब्राह्मण था।
यहाँ पर यह स्पष्ट सूचित किया गया है कि जो व्यक्ति तनिक भी आसुरी वृत्ति का नहीं होता, जैसे प्रह्लाद महाराज या बलि महाराज, वह बाह्यत: असुर हो सकता है या असुरों के वंश में जन्मा हो सकता है। अत: वास्तविक संस्कार कहता है कि मात्र जन्म के अनुसार किसी को असुर या देवता नहीं माना जाना चाहिए। इन्द्र से युद्ध करते समय वृत्रासुर ने अपने को भगवान् का परम भक्त सिद्ध कर दिया था। यही नहीं, इन्द्र से युद्ध बन्द करने के तुरन्त बाद वृत्रासुर वैकुण्ठवासी हो गया और संकर्षण का संगी बन गया। इन्द्र को यह ज्ञात था, अत: ऐसे असुर को, जो वास्तव में एक वैष्णव या ब्राह्मण था, मारने से वह अत्यन्त दुखी था।

वैष्णव पहले से ब्राह्मण होता है, ब्राह्मण भले ही वैष्णव न होता हो। पद्मपुराण का कथन है—

षट्कर्मनिपुणो विप्रो मन्त्रतन्त्रविशारद:।

अवैष्णवो गुरुर्न स्याद् वैष्णव: श्वपचो गुरु: ॥

भले ही कोई अपने संस्कार तथा परिवार से ब्राह्मण हो और वैदिक ज्ञान (मन्त्र-तन्त्र विशारद) में दक्ष हो, किन्तु यदि वह वैष्णव नहीं है, तो गुरु नहीं हो सकता। इसका अभिप्राय यह है कि दक्ष ब्राह्मण वैष्णव नहीं भी हो सकता है, किन्तु एक वैष्णव पहले से ब्राह्मण होता है। एक लखपती के पास सैकड़ों-हजारों रुपये हैं किन्तु जिसके पास सैकड़ों-हजारों रुपए हों तो यह आवश्यक नहीं कि वह लखपती हो। वृत्रासुर परम वैष्णव था, अत: वह ब्राह्मण भी था।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥