श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 13: ब्रह्महत्या से पीडि़त राजा इन्द्र  »  श्लोक 4

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
वृत्रविक्रमसंविग्ना: सर्वे देवा: सहर्षिभि: ।
तद्वधायार्थयन्निन्द्रं नैच्छद् भीतो बृहद्वधात् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; वृत्र—वृत्रासुर के; विक्रम—शौर्य से; संविग्ना:—चिन्तायुक्त होकर; सर्वे—सभी; देवा:—देवतागण; सह ऋषिभि:—महान् साधुओं समेत; तत्-वधाय—उसके वध के लिए; आर्थयन्— प्रार्थना की; इन्द्रम्—इन्द्र से; न ऐच्छत्—इनकार कर दिया; भीत:—डरकर; बृहत्-वधात्—ब्राह्मण वध के कारण ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया—जब समस्त ऋषि तथा देवता वृत्रासुर की असाधारण शक्ति से विचलित हो रहे थे तो उन्होंने एकत्र होकर इन्द्र से उसका वध करने के लिए याचना की थी। किन्तु इन्द्र ने ब्राह्मण-हत्या के भय से उनकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी थी।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥