श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 13: ब्रह्महत्या से पीडि़त राजा इन्द्र  »  श्लोक 7

 
श्लोक
हयमेधेन पुरुषं परमात्मानमीश्वरम् ।
इष्ट्वा नारायणं देवं मोक्ष्यसेऽपि जगद्वधात् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
हयमेधेन—अश्वमेध यज्ञ से; पुरुषम्—परम पुरुष; परमात्मानम्—परमात्मा को; ईश्वरम्—परम नियन्ता; इष्ट्वा—पूजा करके; नारायणम्—भगवान् नारायण को; देवम्—परमेश्वर; मोक्ष्यसे—तुम मुक्त हो जाओगे; अपि—भी; जगत्-वधात्—सारे संसार का वध करने के पाप से ।.
 
अनुवाद
 
 ऋषियों ने आगे कहा—हे राजा इन्द्र! अश्वमेध यज्ञ करके उसके द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को, जो परमात्मा, भगवान्, नारायण और परम नियन्ता हैं, प्रसन्न करके मनुष्य सारे संसार के वध के पाप-फलों से भी मुक्त हो सकता है, वृत्रासुर जैसे एक असुर के वध की तो बात ही क्या है?
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥