श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीपरीक्षिदुवाच
रजस्तम:स्वभावस्य ब्रह्मन् वृत्रस्य पाप्मन: ।
नारायणे भगवति कथमासीद् दृढा मति: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-परीक्षित् उवाच—राजा परीक्षित ने पूछा; रज:—रजोगुण; तम:—तमोगुण; स्व-भावस्य—स्वभाव वाला; ब्रह्मन्—हे विद्वान ब्राह्मण; वृत्रस्य—वृत्रासुर का; पाप्मन:—जो पापी था; नारायणे—भगवान् नारायण में; भगवति—श्री भगवान्; कथम्—किस प्रकार; आसीत्—थी; दृढा—अत्यन्त दृढ़; मति:—चेतना, भक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा—हे विद्वान ब्राह्मण! रजो तथा तमो गुणों से आविष्ट होने के कारण असुर सामान्यत: पापी होते हैं। तो फिर वृत्रासुर भगवान् नारायण के प्रति इतना परम प्रेम किस प्रकार प्राप्त कर सका?
 
तात्पर्य
 इस भौतिक जगत में प्रत्येक प्राणी रजो तथा तमो गुणों से ग्रस्त रहता है। किन्तु जब तक कोई इन गुणों पर विजय प्राप्त करके सात्विकता के स्तर पर नहीं पहुँच जाता तब तक उसके शुद्ध भक्त बनने की संभावना नहीं है। इसकी पुष्टि स्वयं भगवान् कृष्ण ने भगवद्गीता (७.२८) में की है—
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता: ॥

“जिन मनुष्यों ने पूर्वजन्म में पुण्यकर्म किये हैं तथा इस जन्म में जिनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गये हैं तथा जो मोह के द्वन्द्व से मुक्त हो चुके हैं, वे निष्ठापूर्वक मेरी सेवा में तत्पर होते हैं।” चूँकि वृत्रासुर असुर था, अत: महाराज परीक्षित को आश्चर्य हुआ कि वह परम भक्त का पद क्योंकर प्राप्त कर सका?

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥