श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 24

 
श्लोक
तथापि पृच्छतो ब्रूयां ब्रह्मन्नात्मनि चिन्तितम् ।
भवतो विदुषश्चापि चोदितस्त्वदनुज्ञया ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
तथापि—तो भी; पृच्छत:—पूछने पर; ब्रूयाम्—बोलने की आज्ञा दें; ब्रह्मन्—हे परम ब्राह्मण; आत्मनि—मन में; चिन्तितम्—चिन्ता; भवत:—आपको; विदुष:—सब कुछ जानने वाले, सर्वज्ञ; च—तथा; अपि—यद्यपि; चोदित:— प्रेरित होकर; त्वत्—आपकी; अनुज्ञया—आज्ञा से ।.
 
अनुवाद
 
 हे परम आत्मन्! आप सब कुछ जानते हैं, तो भी आप मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं चिन्ता से पूर्ण क्यों हूँ। अत: मैं आपकी आज्ञा के प्रत्युत्तर में कारण को प्रकट कर रहा हूँ।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥