श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 31

 
श्लोक
तस्या अनुदिनं गर्भ: शुक्लपक्ष इवोडुप: ।
ववृधे शूरसेनेशतेजसा शनकैर्नृप ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
तस्या:—उसका; अनुदिनम्—दिनोंदिन; गर्भ:—गर्भ; शुक्ल-पक्षे—शुक्लपक्ष में (चन्द्रमा बढ़ता जाता है); इव—सदृश; उडुप:—चन्द्रमा; ववृधे—क्रमश: बढऩे लगा; शूरसेन-ईश—शूरसेन के राजा; तेजसा—वीर्य से; शनकै:—थोड़ा-थोड़ा करके, क्रमश:; नृप—हे राजा परीक्षित! ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा परीक्षित! शूरसेन के राजा महाराज चित्रकेतु के वीर्य से कृतद्युति का गर्भ उसी प्रकार क्रमश: बढऩे लगा, जिस प्रकार शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा बढ़ता जाता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥